12 साल हिमालय में मौन तप, फिर बदल दी लाखों लोगों की जिंदगी! जानिए कौन थे श्री श्री 1008 साकेतवासी मौनी जी महाराज

41वीं साकेतवास पुण्यतिथि पर श्रद्धा का महासंगम, श्री मौनी जी महाराज के आदर्शों को किया जाएगा नमन

सनातन संत परंपरा के महान आलोकस्तंभ परम श्रद्धेय श्री श्री 1008 साकेतवासी श्री मौनी जी महाराज की 41वीं साकेतवास पुण्यतिथि पर देशभर के श्रद्धालु उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इस अवसर पर 20 और 21 जुलाई 2026 को बिहार के सिवान जिले के श्रीनगर स्थित पिहुली मंदिर परिसर के श्री रामजानकी मंदिर में दो दिवसीय भव्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

इस आयोजन में अखंड श्रीसीताराम नामसंकीर्तन, श्रीरामचरितमानस पाठ, सुंदरकांड पाठ, सामूहिक श्रीहनुमान चालीसा, संत प्रवचन, भजन संध्या और महाप्रसाद भंडारा जैसे अनेक धार्मिक कार्यक्रम होंगे, जिनमें देशभर से संत-महात्माओं और श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है।

संत परंपरा के महान प्रेरणास्रोत थे मौनी जी महाराज

जम्मू-कश्मीर प्रांत के मंदिर एवं गुरुकुल सेवा योजना प्रमुख तथा श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास के मुख्य न्यासी पं. डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय ने कहा कि श्री मौनी जी महाराज का जीवन भारतीय संत परंपरा का जीवंत आदर्श था।

उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति में संत केवल धार्मिक व्यक्तित्व नहीं होते, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले युगपुरुष होते हैं। श्री मौनी जी महाराज ने अपने तप, त्याग, साधना और लोककल्याण के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार किया।

गृहस्थ जीवन में रहकर स्थापित किया संतत्व का आदर्श

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद की पावन धरती पर जन्मे श्री मौनी जी महाराज ने यह सिद्ध किया कि ईश्वर प्राप्ति केवल संन्यासियों का अधिकार नहीं है। यदि गृहस्थ जीवन धर्म, संयम, तपस्या और भगवन्नाम से जुड़ा हो तो वही जीवन मोक्ष का मार्ग बन सकता है।

वे अयोध्या धाम स्थित तपस्वी छावनी के परम श्रद्धेय सिद्ध संत श्री श्री 1008 श्री रामगुलाम दास जी महाराज (बलुईया बाबा) के दीक्षित शिष्य थे। गुरु कृपा और कठोर साधना के बल पर उन्होंने आत्मानुभूति की उच्चतम अवस्थाओं को प्राप्त किया।

12 वर्षों तक हिमालय में की मौन साधना

श्री मौनी जी महाराज के जीवन का सबसे प्रेरणादायक अध्याय उनकी 12 वर्षों की हिमालय स्थित मौन साधना रही। उन्होंने पूरी तरह लोकप्रशंसा से दूर रहकर आत्मचिंतन, भगवन्नाम जप और ईश्वर साधना को अपना जीवन बना लिया।

साधना पूर्ण होने के बाद उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए समर्पित कर दिया और श्रीसीताराम नामसंकीर्तन को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान शुरू किया।

‘भगवन्नाम ही कलियुग का सबसे बड़ा आधार’

मौनी जी महाराज का संदेश अत्यंत सरल था। उनका मानना था कि कलियुग में केवल भगवन्नाम ही मनुष्य के लिए सबसे बड़ा सहारा है। उन्होंने किसी कठिन साधना या जटिल दर्शन की बजाय सामान्य जन को ‘श्रीसीताराम’ नाम के अखंड जप का मार्ग बताया।

उनकी प्रेरणा से देश के अनेक राज्यों में आज भी श्रीसीताराम नामसंकीर्तन, रामायण पाठ, मानस कथा और श्री सियाराम विवाहोत्सव जैसे आयोजन नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महान प्रणेता

मौनी जी महाराज केवल आध्यात्मिक संत ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के महान संवाहक भी थे। उन्होंने देशभर में श्री सियाराम विवाहोत्सव, श्रीराम कलेवा, नामसंकीर्तन और अन्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से समाज में सांस्कृतिक चेतना को मजबूत किया।

विशेष रूप से उनकी जन्मभूमि बलिया में पिछले लगभग 76 वर्षों से पौष मास में आयोजित होने वाला श्रीसीताराम नामसंकीर्तन, दुल्हा सरकार की भव्य बारात तथा श्री सियाराम विवाहोत्सव आज भी उनकी अमिट प्रेरणा का प्रतीक है।

20–21 जुलाई को होगा भव्य धार्मिक आयोजन

41वीं साकेतवास पुण्यतिथि के अवसर पर बिहार के श्रीनगर, पिहुली मंदिर (सिवान) स्थित श्री रामजानकी मंदिर में दो दिवसीय धार्मिक महोत्सव आयोजित होगा।

इस आयोजन में—

  • अखंड श्रीसीताराम नामसंकीर्तन
  • श्रीरामचरितमानस अखंड पाठ
  • सुंदरकांड पाठ
  • सामूहिक श्रीहनुमान चालीसा
  • संत प्रवचन
  • भजन संध्या
  • महाप्रसाद भंडारा

का आयोजन किया जाएगा।

यह कार्यक्रम महंत श्री श्री 108 श्री राघव दास जी महाराज, श्री श्री 1008 श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट न्यास तथा बिहार प्रदेश के श्रद्धालु शिष्यों एवं भक्तों के सहयोग से संपन्न होगा।

आज भी जीवित हैं उनके आदर्श

वर्ष 1986 में आषाढ़ शुक्ल अष्टमी के पावन अवसर पर श्री मौनी जी महाराज साकेतवासी हुए, लेकिन उनके विचार, संस्कार और आध्यात्मिक परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं के जीवन को दिशा दे रही है।

उनके अनुयायी मानते हैं कि समाज का वास्तविक उत्थान केवल आध्यात्मिक जागरण, सदाचार, सेवा और भगवन्नाम के प्रसार से ही संभव है।

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