False Promise to Marry: दोनों पहले से शादीशुदा थे, फिर शादी का वादा कैसे? हिमाचल हाई कोर्ट ने आरोपी को दी जमानत, Section 69 BNS पर अहम टिप्पणी

नई दिल्ली। शादी के कथित झूठे वादे पर शारीरिक संबंध बनाने के आरोप से जुड़े एक मामले में हिमाचल हाई कोर्ट ने जमानत के स्तर पर Section 69 BNS को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि मामले में आरोपी और शिकायतकर्ता दोनों पहले से विवाहित थे और दोनों को एक-दूसरे की वैवाहिक स्थिति की जानकारी थी।

अदालत के मुताबिक, जब दोनों ने अपने-अपने जीवनसाथियों से तलाक नहीं लिया था, तब उनके बीच तत्काल वैध विवाह संभव नहीं था। उपलब्ध रिकॉर्ड में कथित शादी का वादा भी शिकायतकर्ता के अपने पति से तलाक लेने की स्थिति से जुड़ा बताया गया था।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी विनोद कुमार को नियमित जमानत दे दी। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर की गई यह टिप्पणी मामले के अंतिम ट्रायल को प्रभावित नहीं करेगी।

क्या है शादी के कथित झूठे वादे का मामला?

यह मामला Vinod Kumar v. State of Himachal Pradesh के रूप में हाई कोर्ट के सामने आया था। मामले में 22 जून 2026 को बिलासपुर के महिला पुलिस थाने में FIR दर्ज की गई थी।

आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64 और 69 के साथ-साथ SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत आरोप लगाए गए थे।

शिकायतकर्ता की उम्र 31 वर्ष बताई गई है। उसका आरोप था कि आरोपी ने उससे शादी करने का भरोसा दिया और इसी आधार पर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए।

आरोपी 17 अगस्त 2026 से न्यायिक हिरासत में था और उसने BNSS के तहत नियमित जमानत के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था।

दोनों पहले से शादीशुदा थे

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने जो तथ्य आए, उनमें दोनों की वैवाहिक स्थिति महत्वपूर्ण रही।

रिकॉर्ड के अनुसार शिकायतकर्ता की शादी वर्ष 2017 में मनोज से हुई थी। बाद में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद हुआ और दोनों अलग रहने लगे।

शिकायतकर्ता के मुताबिक, वर्ष 2022 में उसकी मुलाकात आरोपी विनोद कुमार से हुई। आरोपी पेशे से ज्योतिषी बताया गया है।

शिकायत के अनुसार आरोपी ने उसकी कुंडली देखने के बाद उसे अपने पति से तलाक लेने के लिए प्रेरित किया और कथित तौर पर कहा कि उसके मौजूदा विवाह में अच्छा पारिवारिक जीवन नहीं होगा।

लेकिन इस मामले का अहम पहलू यह था कि आरोपी स्वयं भी विवाहित था और शिकायतकर्ता को उसकी वैवाहिक स्थिति की जानकारी होने की बात रिकॉर्ड में सामने आई।

कोर्ट ने पूछा- जब दोनों शादीशुदा थे तो तत्काल विवाह कैसे संभव था?

हाई कोर्ट ने इसी परिस्थिति को जमानत पर विचार करते हुए महत्वपूर्ण माना।

अदालत के सामने यह तथ्य था कि कथित शादी का वादा तत्काल विवाह का नहीं, बल्कि शिकायतकर्ता के अपने पति से तलाक लेने के बाद शादी से संबंधित था। दूसरी तरफ आरोपी ने भी अपनी पत्नी से तलाक नहीं लिया था।

ऐसे में अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि उस समय दोनों के बीच तत्काल वैध विवाह संभव नहीं था।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने जमानत के सीमित उद्देश्य से Section 69 BNS के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनने को लेकर संदेह व्यक्त किया।

Section 69 BNS क्या कहती है?

भारतीय न्याय संहिता की Section 69 ऐसे मामलों से संबंधित है, जहां किसी महिला से शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी, नौकरी, पदोन्नति या किसी अन्य लाभ का ऐसा वादा किया जाता है जिसे पूरा करने का इरादा नहीं था, या पहचान छिपाकर संबंध बनाए जाते हैं।

इस प्रावधान के तहत दोष सिद्ध होने पर 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।

हालांकि, किसी मामले में Section 69 लागू होने के लिए केवल यह आरोप पर्याप्त नहीं होता कि शादी का वादा किया गया था। अदालत को मामले के तथ्यों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर यह देखना होता है कि कथित वादा किस प्रकृति का था और क्या वह शुरुआत से ही झूठा या पूरा करने के इरादे के बिना किया गया था।

हाई कोर्ट ने जमानत के स्तर पर क्या माना?

अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की वैवाहिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए कहा कि जमानत के सीमित उद्देश्य के लिए Section 69 का प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता।

यहां अदालत ने मामले के अंतिम गुण-दोष पर फैसला नहीं दिया। यानी कोर्ट ने यह घोषित नहीं किया कि शिकायत में लगाए गए आरोप गलत हैं या आरोपी अंततः दोषमुक्त हो जाएगा।

यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमानत की सुनवाई और ट्रायल में आरोपों का अंतिम निर्धारण अलग-अलग कानूनी चरण हैं।

‘Bail is Rule’ सिद्धांत का भी उल्लेख

हाई कोर्ट ने जमानत के सामान्य कानूनी सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Dataram Singh v. State of Uttar Pradesh सहित अन्य फैसलों में बताए गए सिद्धांतों को ध्यान में रखा।

अदालत ने यह भी देखा कि मामले की जांच पूरी हो चुकी थी और आरोपी से आगे किसी रिकवरी की जरूरत नहीं थी।

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी विनोद कुमार को नियमित जमानत देने का फैसला किया।

जमानत मिली, आरोप खत्म नहीं हुए

इस मामले में सबसे जरूरी बात यह समझना है कि हाई कोर्ट से जमानत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को मामले में बरी कर दिया गया है।

अदालत की टिप्पणी मुख्य रूप से जमानत के चरण पर Section 69 BNS के प्रथम दृष्टया परीक्षण से संबंधित है। ट्रायल के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन किया जाएगा।

इसी तरह, शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए अन्य आरोप भी अपनी अलग कानूनी प्रक्रिया के तहत देखे जाएंगे।

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