उत्तर प्रदेश: के चर्चित कोडीनयुक्त कफ सिरप मामले में जांच एजेंसियों को एक अहम सुराग मिलने की खबर है। एजेंसियों को पहले आशंका थी कि कथित सिंडिकेट से जुड़ा आरोपी वरुण सिंह दुबई में मौजूद है, लेकिन अब जांच में संकेत मिले हैं कि वह काफी पहले भारत लौट चुका हो सकता है। फिलहाल वह जांच एजेंसियों की पकड़ से बाहर है और उसकी तलाश की जा रही है।
यह मामला कथित तौर पर कोडीनयुक्त कफ सिरप की अवैध खरीद-बिक्री और सप्लाई नेटवर्क से जुड़ा है। जांच में शुभम जायसवाल का नाम प्रमुख आरोपी के तौर पर सामने आया है। वरुण सिंह को उसका कारोबारी साझेदार बताया गया है। आरोप है कि वरुण झारखंड के धनबाद और रांची में इस नेटवर्क से जुड़ा कारोबार संभालता था।
जांच एजेंसियों के लिए वरुण की तलाश इसलिए भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि उसकी गिरफ्तारी से कथित नेटवर्क के वित्तीय लेनदेन, फर्जी फर्मों और दवाओं की सप्लाई से जुड़े कई पहलुओं पर जानकारी मिल सकती है। हालांकि, उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।
पहले दुबई में होने की थी आशंका, अब भारत में तलाश
शुरुआती जानकारी के मुताबिक, जांच एजेंसियों को संदेह था कि वरुण सिंह, शुभम जायसवाल और गौरव जायसवाल के साथ दुबई में मौजूद है। लेकिन बाद में जुटाई गई जानकारी से यह आशंका बनी कि वरुण दुबई गया जरूर था, मगर काफी पहले भारत लौट आया। इसी वजह से उसकी तलाश का दायरा फिर से भारत में केंद्रित किया जा रहा है।
दूसरी ओर, शुभम जायसवाल और गौरव जायसवाल को भारत लाने के प्रयास भी जारी बताए गए हैं। जांच एजेंसियां इस प्रक्रिया के लिए संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों के संपर्क में हैं। विदेश में मौजूद आरोपियों की वापसी की प्रक्रिया में कानूनी औपचारिकताएं और संबंधित देशों के साथ समन्वय महत्वपूर्ण होता है।
फिलहाल वरुण के संभावित ठिकाने को लेकर कोई पुख्ता सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि जांच एजेंसियों को उसकी सटीक लोकेशन मिल गई है। अभी तक सामने आई जानकारी उसे भारत में छिपे होने की आशंका के तौर पर ही पेश करती है।

धनबाद और रांची में कथित कारोबार की जिम्मेदारी
जांच से जुड़े विवरणों के अनुसार, वरुण सिंह की भूमिका कथित सिंडिकेट के झारखंड स्थित कारोबार में अहम बताई गई है। पूछताछ के दौरान गिरफ्तार आरोपी आलोक सिंह ने कथित तौर पर जांचकर्ताओं को बताया था कि उसकी बातचीत वरुण सिंह, गौरव जायसवाल और विशाल मेहरोत्रा से हुई थी।
इसी सिलसिले में जनवरी 2024 में धनबाद में श्रेयसी मेडिकल एजेंसी नाम से एक फर्म खोले जाने की जानकारी सामने आई। बताया गया कि यह फर्म आलोक सिंह के नाम पर बनाई गई थी। आरोप है कि आलोक सिंह और अमित कुमार सिंह उर्फ अमित टाटा ने कारोबार में पांच-पांच लाख रुपये लगाए थे। दोनों के जेल में होने की जानकारी भी रिपोर्टों में दी गई है।
जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इन फर्मों के जरिए किस तरह का कारोबार किया गया, सिरप की सप्लाई कहां-कहां हुई और लेनदेन में किन लोगों की भूमिका थी।
फर्जी बिल और ई-वे बिल के इस्तेमाल का आरोप
इस मामले में जांच एजेंसियों को संदेह है कि कथित नेटवर्क ने फर्जी फर्मों, कूटरचित बिलों और ई-वे बिल के जरिए कफ सिरप की खरीद-बिक्री को वैध कारोबारी गतिविधि के रूप में दिखाया। आरोप है कि दस्तावेजों में दिखाई गई खरीद-बिक्री और दवाओं की वास्तविक आवाजाही के बीच अंतर हो सकता है।
इसी पहलू की जांच के लिए फर्मों के पंजीकरण संबंधी दस्तावेजों, बैंक खातों, वित्तीय लेनदेन और सप्लाई रिकॉर्ड की पड़ताल की जा रही है। यदि दस्तावेजों में हेराफेरी की पुष्टि होती है, तो इससे नेटवर्क में शामिल अन्य लोगों की भूमिका का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
जांचकर्ताओं के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि कथित सप्लाई चेन में शामिल अलग-अलग कारोबारियों और फर्मों के बीच संबंधों को स्पष्ट किया जाए। केवल किसी फर्म का नाम सामने आना अपने आप में अपराध का प्रमाण नहीं है; इसके लिए संबंधित दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों की जांच जरूरी है।
शुभम जायसवाल और कथित सिंडिकेट की भूमिका
कफ सिरप मामले में शुभम जायसवाल को कथित नेटवर्क का प्रमुख संचालक बताया गया है। इससे पहले की जांच में कई फर्मों और दवा कारोबार से जुड़े लोगों की भूमिका सामने आने की खबरें आई थीं। कुछ आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित नेटवर्क का संचालन कैसे होता था, धन का प्रबंधन कौन करता था और सिरप की सप्लाई किन रास्तों से की जाती थी। वरुण सिंह की गिरफ्तारी से इन सवालों के जवाब मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, इस पूरे मामले में अलग-अलग आरोपियों की भूमिका अलग हो सकती है। किसी व्यक्ति को सिंडिकेट से जुड़ा बताया जाना और अदालत में उसका अपराध साबित होना दो अलग बातें हैं। मामले में अंतिम निष्कर्ष संबंधित साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
आगे की जांच में क्या हो सकता है खुलासा?
वरुण सिंह की तलाश के साथ जांच एजेंसियों के सामने कथित नेटवर्क के वित्तीय और कारोबारी संबंधों को जोड़ने की चुनौती है। फर्जी फर्मों के आरोप, संदिग्ध बिल, बैंक लेनदेन और दवाओं की वास्तविक सप्लाई से जुड़े रिकॉर्ड जांच की दिशा तय कर सकते हैं।
यदि वरुण पकड़ा जाता है, तो उससे धनबाद और रांची में कथित कारोबार, अन्य सहयोगियों और सप्लाई चेन को लेकर पूछताछ की जा सकती है। वहीं, विदेश में मौजूद बताए जा रहे अन्य आरोपियों को भारत लाने की प्रक्रिया भी मामले की जांच में अहम साबित हो सकती है।
फिलहाल जांच जारी है और वरुण सिंह की गिरफ्तारी को लेकर कोई अंतिम जानकारी सामने नहीं आई है। आने वाले दिनों में एजेंसियों की कार्रवाई से इस कथित नेटवर्क की संरचना और उसमें शामिल लोगों की भूमिका को लेकर और तथ्य सामने आ सकते हैं।



