गोंडा, (उत्तर प्रदेश) उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। पूर्व सांसद, पूर्व कैबिनेट मंत्री और मनकापुर स्टेट के राजा आनंद सिंह का शनिवार तड़के 3 बजे लखनऊ में निधन हो गया। उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। 87 वर्षीय राजा साहब की मृत्यु की खबर से गोंडा, मनकापुर और पूरे पूर्वांचल में शोक की लहर दौड़ गई।
जनता के ‘राजा’ को अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब
राजा साहब का पार्थिव शरीर उनके पैतृक आवास मनकापुर कोट लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। उनके पुत्र और केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी।
करीब एक किलोमीटर लंबी शवयात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। लोग “राजा साहब अमर रहें” के नारों के साथ भावभीनी विदाई देते रहे। शाही परंपराओं और जनभावनाओं के मिश्रण से यह अंतिम यात्रा एक ऐतिहासिक दृश्य बन गई।
गोंडा की आत्मा से जुड़े थे राजा साहब
राजा आनंद सिंह ने चार बार गोंडा लोकसभा सीट से संसद का प्रतिनिधित्व किया। 1971, 1980, 1984 और 1989 में वे कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। इसके बाद 2012 में वे सपा से गौरा विधानसभा से विधायक बने और अखिलेश सरकार में कृषि मंत्री बनाए गए।
उनके समर्थक उन्हें ‘यूपी टाइगर’ और ‘जनता का राजा’ कहकर संबोधित करते थे। वे किसानों की आवाज़ माने जाते थे। बीज वितरण, ऋण माफी और फसल बीमा योजनाएं उनके ही कार्यकाल में लागू की गई थीं।
राजनीतिक विरासत: बेटे कीर्तिवर्धन सिंह अब केंद्रीय मंत्री
राजा साहब के पुत्र कीर्तिवर्धन सिंह उर्फ राजा भैया वर्तमान में भाजपा सांसद हैं और केंद्र सरकार में विदेश राज्य मंत्री के पद पर कार्यरत हैं। पिता के निधन के बाद उन्होंने भावुक होकर ट्वीट किया—
“पूज्य पिताश्री का देवलोकगमन मेरे जीवन की अपूरणीय क्षति है।”
श्रद्धांजलियों का सिलसिला, हर दल के नेता हुए शामिल
राजा साहब को अंतिम विदाई देने के लिए कांग्रेस, भाजपा और सपा के कई वरिष्ठ नेता, पूर्व विधायक, सांसद और हजारों कार्यकर्ता पहुंचे। गोंडा के विधायक प्रभात वर्मा, पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह, और कई प्रमुख नेता मौजूद रहे। सोशल मीडिया पर भी श्रद्धांजलियों की बाढ़ सी आ गई।
निष्कर्ष: राजा थे, पर जनता के नेता बनकर जिए
राजा आनंद सिंह का जीवन राजनीति, समाजसेवा और जनता की सेवा को समर्पित रहा। वे राजा होकर भी जनता के दर्द को अपना समझते थे। उनका निधन न केवल एक राजनीतिक युग के अंत का संकेत है, बल्कि पूर्वांचल के राजनीतिक नक्शे पर एक गहरी रिक्तता छोड़ गया है।

