साउथ कोलकाता: लॉ कॉलेज में एक छात्रा के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने पूरे राज्य में राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है। जहां विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इस मुद्दे को लेकर टीएमसी सरकार पर आक्रामक हमले कर रही है, वहीं टीएमसी नेताओं के संवेदनहीन और विवादित बयान आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।
🗣️ मदन मित्रा का बयान: “वह घटनास्थल पर गई ही क्यों?”
टीएमसी के वरिष्ठ नेता और विधायक मदन मित्रा ने बयान देकर चौतरफा आलोचना बटोरी है। उन्होंने छात्रा की जिम्मेदारी तय करते हुए कहा:
“अगर छात्रा घटनास्थल पर नहीं जाती, तो यह घटना नहीं होती। अगर उसने किसी को बताया होता कि वह कहां जा रही है या दोस्तों को साथ ले जाती, तो ये नहीं होता।”
यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक आलोचना की बाढ़ आ गई। लोगों ने इसे विक्टिम ब्लेमिंग का ज्वलंत उदाहरण बताया।
🔄 सफाई में उतरे मदन मित्रा
बढ़ते विरोध के बीच मदन मित्रा ने सफाई दी कि उनके बयान को “गलत संदर्भ में लिया गया” है। उन्होंने दावा किया कि वे महिला सुरक्षा के पक्ष में हैं और उनका उद्देश्य पीड़िता को दोषी ठहराना नहीं था।
💬 कल्याण बनर्जी का बयान: “दोस्तों ने किया, पुलिस क्या करेगी?”
इससे पहले टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी का भी एक विवादास्पद बयान सामने आया था। उन्होंने कहा:
“अगर कोई दोस्त अपने दोस्त के साथ दुष्कर्म करता है तो क्या किया जा सकता है? स्कूलों में पुलिस होगी क्या?”
उनके अनुसार यह “छात्रों द्वारा एक अन्य छात्रा के साथ किया गया कृत्य” था और उन्होंने मुख्य आरोपी के टीएमसी कनेक्शन पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
🔥 बीजेपी का तीखा हमला
भाजपा ने टीएमसी नेताओं के बयानों को “शर्मनाक और असंवेदनशील” करार दिया। भाजपा नेताओं ने कहा कि जब सत्ता पक्ष के वरिष्ठ नेता ही महिलाओं पर आरोप लगाने लगें, तो महिला सुरक्षा की उम्मीद बेमानी हो जाती है। पार्टी ने मांग की कि दोनों नेताओं से बयान वापस लेकर माफी मांगी जाए।
❓ महिला सुरक्षा पर खड़ा हुआ सवाल
इस पूरी घटना से जहां राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं, वहीं पीड़िता को समर्थन देने की बजाय सत्ता पक्ष के नेताओं के बयानों ने सामाजिक चिंता और बढ़ा दी है।
📌 निष्कर्ष:
एक ओर देश भर में महिला सुरक्षा को लेकर आवाजें बुलंद हो रही हैं, वहीं पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी के नेता पीड़िता को दोषी ठहराते हुए बयान दे रहे हैं। ऐसे वक्त में ज़रूरत है संवेदनशीलता, जवाबदेही और कानून का सख्ती से पालन करने की, न कि दोषियों को राजनीतिक संरक्षण देने या पीड़ितों पर सवाल उठाने की।

