दिल्ली हाईकोर्ट: ने गुरुवार को बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को डाबर च्यवनप्राश के खिलाफ किसी भी नकारात्मक, भ्रामक या मानहानिकारक विज्ञापन को प्रसारित करने से रोक दिया है। यह आदेश जस्टिस मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने डाबर इंडिया लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
⚖️ क्या कहा कोर्ट ने?
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि
“पतंजलि आयुर्वेद अब डाबर च्यवनप्राश या उसके किसी उत्पाद को लक्षित कर भ्रामक या अपमानजनक विज्ञापन जारी नहीं कर सकता।”
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बाबा रामदेव और पतंजलि की मार्केटिंग रणनीति लगातार आलोचनाओं के घेरे में रही है, खासकर प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स को निशाना बनाकर चलाए जा रहे प्रचार को लेकर।
🧪 डाबर की आपत्ति: ग्राहकों को किया जा रहा गुमराह
डाबर ने अपनी याचिका में कहा कि उनका च्यवनप्राश शुद्ध आयुर्वेदिक औषधि है और देशभर में लाखों लोग दशकों से उस पर भरोसा करते आए हैं।
डाबर का आरोप है कि पतंजलि द्वारा प्रसारित विज्ञापनों में ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे डाबर च्यवनप्राश स्वास्थ्य के लिए हानिकारक या कम गुणवत्ता वाला है, जिससे उपभोक्ताओं में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
🧘♂️ क्या है विज्ञापन में विवादित दावा?
पतंजलि द्वारा प्रसारित कुछ वीडियो और प्रिंट विज्ञापनों में यह संदेश दिया गया कि कुछ बाजार में बिकने वाले च्यवनप्राश केवल ब्रांड हैं, असली आयुर्वेदिक नहीं। इन विज्ञापनों में गुणवत्ता, शुद्धता और औषधीय प्रभाव को लेकर तुलना की गई, जिससे सीधे डाबर जैसे स्थापित ब्रांडों की छवि प्रभावित हुई।
🏷️ ब्रांड्स की टकराहट: स्वास्थ्य के नाम पर मार्केटिंग वॉर
पिछले कुछ वर्षों में पतंजलि ने कई नामी FMCG कंपनियों के उत्पादों को “केमिकलयुक्त”, “नकली आयुर्वेद” और “मुनाफाखोरी” कहकर प्रचार किया है।
हालांकि इस बार डाबर ने कानूनी मोर्चा खोलते हुए साफ कर दिया कि किसी भी प्रतिस्पर्धी को नीचे दिखाकर प्रचार करना नैतिक और कानूनी रूप से गलत है।
📌 क्या होगा आगे?
कोर्ट ने पतंजलि को आगामी सुनवाई तक इस तरह के विज्ञापन प्रसारित न करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अगली तारीख पर कोर्ट पतंजलि से विस्तृत जवाब भी मांगेगा कि विज्ञापनों में डाबर को लेकर किस आधार पर दावे किए गए।
🧾 निष्कर्ष: उपभोक्ता की पसंद पर असर डालना अब नहीं आसान
यह मामला बाजार में ब्रांड प्रतिस्पर्धा की मर्यादा और नियमों की अहमियत को रेखांकित करता है। कोर्ट का फैसला बताता है कि भ्रामक प्रचार और उत्पादों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति पर अब सख्त नजर रखी जाएगी।

