पेरिस। फ्रांस में छात्र प्रदर्शनों के बीच एक ऐसा नारा चर्चा का विषय बन गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ सुनने में जितना अजीब लगता है, उसके पीछे छिपी कहानी उतनी ही दिलचस्प और विवादास्पद है। ‘Bismillah, c’est les ténèbres’ नाम का यह वाक्यांश सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हुआ और प्रदर्शनकारियों के पोस्टर तथा नारों में दिखाई देने लगा। सवाल यह है कि आखिर इस वाक्यांश में ऐसा क्या है, जिसने युवाओं के बीच इसे विरोध का प्रतीक बना दिया?
इस नारे की लोकप्रियता केवल इसके अनोखे शब्दों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे छात्रों की नाराजगी, पुलिस की भूमिका को लेकर उठे सवाल और नस्लीय रूढ़ियों पर व्यंग्य जैसे मुद्दे जुड़े हुए हैं। सोशल मीडिया पर शुरू हुई यह चर्चा अब फ्रांस के युवा आंदोलन की पहचान का हिस्सा बन गई है।
आखिर क्या है ‘Bismillah, c’est les ténèbres’ का अर्थ?
इस वाक्यांश को समझने के लिए इसके दोनों हिस्सों का अर्थ जानना जरूरी है। अरबी शब्द ‘बिस्मिल्लाह’ का अर्थ है ‘अल्लाह के नाम से’ या ‘ईश्वर के नाम पर’। मुस्लिम समुदाय में किसी काम की शुरुआत से पहले इस अभिव्यक्ति का इस्तेमाल किया जाता है। फ्रांस की बोलचाल में इसका प्रयोग कुछ संदर्भों में ‘चलो, शुरू करते हैं’ जैसे भाव में भी हो सकता है।
वहीं, फ्रेंच वाक्यांश ‘c’est les ténèbres’ का मोटा अर्थ है ‘यह अंधकार है’ या ‘हालात बेहद निराशाजनक हैं’। दोनों को जोड़ने पर इसका शाब्दिक अर्थ कुछ ऐसा बनता है—‘ईश्वर के नाम पर, यह अंधकार है।’
हालांकि, इस पूरे वाक्य का कोई स्पष्ट और स्वाभाविक अर्थ नहीं निकलता। यही असामान्य मेल इसे व्यंग्य का विषय बनाता है। प्रदर्शनकारी इसे ऐसे व्यक्ति की नकल के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जो युवाओं की भाषा और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझे बिना उनकी तरह बोलने की कोशिश कर रहा हो।

स्नैपचैट के एक संदेश से कैसे शुरू हुई चर्चा?
इस नारे की कहानी अक्टूबर 2026 की शुरुआत में सोशल मीडिया पर प्रसारित एक स्नैपचैट बातचीत के स्क्रीनशॉट से जुड़ी बताई जाती है। उस संदेश में ‘Mamadou’ नाम से दिखाई देने वाला एक यूजर प्रदर्शनकारियों के समूह में शामिल होने और स्कूलों में होने वाली नाकाबंदी की जानकारी मांगता नजर आया।
संदेश में अरबी अभिव्यक्ति, फ्रेंच स्लैंग और युवाओं की बोलचाल जैसे शब्दों का मिश्रण था। स्क्रीनशॉट सामने आने के बाद कुछ छात्रों और सोशल मीडिया यूजर्स ने संदेह जताया कि संबंधित अकाउंट किसी ऐसे व्यक्ति का हो सकता है, जो प्रदर्शनकारियों के निजी समूहों में जानकारी जुटाने के उद्देश्य से शामिल होना चाहता था।
कुछ लोगों ने इसे कथित अंडरकवर पुलिस गतिविधि से जोड़कर देखा। उनका आरोप था कि पुलिसकर्मी छात्रों की तरह दिखने या बोलने की कोशिश करते हुए उनके समूहों तक पहुंचना चाहते थे।
हालांकि, इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संबंधित संदेश निश्चित रूप से किसी पुलिस अधिकारी ने ही भेजा था। फिलहाल, इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक संदिग्ध माने गए संदेश ने किस तरह व्यापक ऑनलाइन चर्चा को जन्म दे दिया।
छात्रों के विरोध का प्रतीक कैसे बना यह नारा?
छात्रों ने इस वाक्यांश को केवल मजाक तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए यह संस्थानों और युवाओं के बीच बढ़ती दूरी, निगरानी को लेकर चिंता और नस्लीय पूर्वाग्रहों पर सवाल उठाने का माध्यम बन गया।
फ्रांस में छात्र आंदोलन के पीछे शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें भी हैं। भीड़भाड़ वाली कक्षाएं, शिक्षकों की कमी, शैक्षणिक संसाधनों की समस्या और अवसरों में असमानता जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं में असंतोष सामने आया है। इसके साथ ही महंगाई और जीवन-यापन की बढ़ती लागत ने भी व्यापक विरोध प्रदर्शनों को हवा दी है।
ऐसे माहौल में यह नारा युवाओं के लिए एक साझा संकेत बन गया। पोस्टरों, मीम्स और वीडियो के माध्यम से इसका इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शनकारियों ने गंभीर मुद्दों को व्यंग्यात्मक अंदाज में सामने रखा।
पुलिस और नस्लीय रूढ़ियों को लेकर क्यों उठे सवाल?
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू फ्रांस में अरब और अफ्रीकी मूल के युवाओं को लेकर प्रचलित रूढ़ियों से जुड़ा है। आलोचकों का कहना है कि किसी समुदाय की भाषा, नाम या सांस्कृतिक पहचान की सतही नकल करके उससे जुड़ने की कोशिश करना पूर्वाग्रहों को मजबूत कर सकता है।
इसी कारण इस वाक्यांश को कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस की कथित निगरानी और संस्थागत व्यवहार पर व्यंग्य के रूप में देखते हैं। यह बहस केवल पुलिस की भूमिका तक सीमित नहीं है, बल्कि इस सवाल को भी सामने लाती है कि क्या सरकारी संस्थाएं युवाओं की वास्तविक चिंताओं को समझ पा रही हैं।
हालांकि, इस मामले में आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। किसी वायरल स्क्रीनशॉट के आधार पर पूरी पुलिस व्यवस्था के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
फ्रांस से बाहर भी पहुंची नारे की गूंज
सोशल मीडिया की ताकत ने इस नारे को फ्रांस की सीमाओं से बाहर भी पहुंचाया है। अक्टूबर 2026 में बेल्जियम और इटली में हुए प्रदर्शनों से जुड़ी तस्वीरों और पोस्टों में भी यह वाक्यांश दिखाई देने की खबरें सामने आईं।
इससे पता चलता है कि आज के युवा आंदोलन केवल पारंपरिक भाषणों और नारों तक सीमित नहीं हैं। मीम्स, छोटे वीडियो, इंटरनेट की भाषा और लोकप्रिय सांस्कृतिक संदर्भ भी विरोध दर्ज कराने के साधन बन रहे हैं।
युवाओं के लिए व्यंग्य कभी-कभी ऐसी बात कहने का तरीका बन जाता है, जिसे वे सामान्य राजनीतिक भाषा में प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते। हालांकि, किसी नारे की लोकप्रियता अपने आप में उसके पीछे लगाए गए हर आरोप को सच साबित नहीं करती।



