लखनऊ : उत्तर प्रदेश में शिक्षा का मंदिर समझे जाने वाले विश्वविद्यालयों में भ्रष्टाचार की दीवारें खड़ी हो चुकी हैं। हाल ही में सामने आए एक बड़े घोटाले में खुलासा हुआ है कि मात्र ₹35 लाख की ‘फीस’ देकर कोई भी असिस्टेंट प्रोफेसर बन सकता था। यह खेल कोई नया नहीं, बल्कि 2006 से सुनियोजित तरीके से चला आ रहा था।
‘पेपर हमारे पास है, ₹35 लाख दो, क्लास में बस बैठना है’
घोटाले में शामिल लोगों का दावा था—
“तुम्हारे विषय का पेपर मेरे पास है। बस 35 लाख लगेंगे… क्लासरूम में बैठना है, बाकी हम देख लेंगे।”
इस तरह के जुमले उन उम्मीदवारों से कहे जाते थे, जो आयोग की असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा में शामिल होना चाहते थे।
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की परीक्षा में सेंध
STF को मिली शिकायतों के अनुसार, असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा किया गया। प्री-प्लान्ड तरीके से पेपर आउट, फिक्स पासिंग मार्क्स और फर्जी कैंडिडेट तैयार किए जाते थे। कई बार असली उम्मीदवार की जगह डमी कैंडिडेट को बैठाया गया।
माफिया की ‘पाठशाला’ की पूरी स्क्रिप्ट तैयार
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पहले विषयवार पेपर लीक किए जाते
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अभ्यर्थियों से मोटी रकम ली जाती
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परीक्षा हॉल में उपस्थित दर्ज कराने की व्यवस्था माफिया करता
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उत्तर पुस्तिका में पहले से उत्तर भरे जाते या कॉपी बदली जाती
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परीक्षा के बाद पैसे का अंतिम किस्त वसूला जाता
आयोग की साख पर सवाल, STF की कार्रवाई तेज
घोटाले के खुलासे के बाद उत्तर प्रदेश STF ने कई संदिग्ध व्यक्तियों को हिरासत में लिया है। अब तक चार रैकेट संचालकों के नाम सामने आए हैं, जो लखनऊ, प्रयागराज और कानपुर में सक्रिय थे।
राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण का भी शक
शिक्षा जगत में सक्रिय लोगों का कहना है कि इतने बड़े स्तर पर यह खेल बिना प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं हो सकता। STF अब उन अधिकारियों और आयोग के सदस्यों से भी पूछताछ कर रही है जिनके कार्यकाल में ये घोटाले हुए।
शिक्षा व्यवस्था पर गहरा सवाल
यह घोटाला केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि शिक्षा की बुनियाद पर हमला है। सवाल यह भी है कि जो लोग इस तरह से प्रोफेसर बन रहे हैं, वे आने वाली पीढ़ियों को क्या शिक्षा देंगे?



