भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम! केंद्र-एमपी सरकार को नोटिस, नमाज के लिए अलग जगह देने का सुझाव

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमाल मौला परिसर को लेकर चल रहे लंबे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान इसे अत्यंत संवेदनशील बताते हुए केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है। साथ ही अदालत ने कहा कि सभी पक्षों के अधिकारों का सम्मान करते हुए ऐसा समाधान तलाशा जाना चाहिए जिससे कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द दोनों बने रहें।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि अंतरिम व्यवस्था के तौर पर मुस्लिम समुदाय के लिए परिसर के आसपास किसी उपयुक्त स्थान पर नमाज की व्यवस्था की जा सकती है, ताकि अंतिम निर्णय आने तक किसी भी पक्ष के अधिकारों को अनावश्यक रूप से प्रभावित न किया जाए।


क्या है भोजशाला विवाद?

धार स्थित भोजशाला परिसर की धार्मिक पहचान को लेकर वर्षों से विवाद जारी है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने आदेश में परिसर को देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर माना था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।


केंद्र और एमपी सरकार को नोटिस

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है।

अदालत ने कहा कि मामले के सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं की विस्तृत जांच की जाएगी। तब तक किसी भी प्रकार का ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे विवाद और बढ़े।


नमाज के लिए अलग स्थान का सुझाव

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतरिम व्यवस्था के रूप में मुस्लिम समुदाय के लिए शुक्रवार को दोपहर 1 बजे से 3 बजे के बीच परिसर के निकट किसी उपयुक्त खुले स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने पर विचार किया जा सकता है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सुझाव अंतिम निर्णय नहीं है, बल्कि सुनवाई पूरी होने तक शांति और संतुलन बनाए रखने की एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में देखा जाना चाहिए।


ASI को भी दिया महत्वपूर्ण निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को निर्देश दिया कि सर्वोच्च अदालत की अनुमति के बिना भोजशाला परिसर में किसी भी प्रकार का संरचनात्मक परिवर्तन न किया जाए।

इस निर्देश का उद्देश्य मौजूदा स्थिति को बनाए रखना है ताकि सुनवाई के दौरान किसी भी प्रकार का विवाद या तथ्यात्मक बदलाव न हो।


‘हर शब्द सोच-समझकर बोलना होगा’

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि यह मामला बेहद संवेदनशील है और अदालत में कही जाने वाली हर बात का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालय को बेहद सावधानी से शब्दों का चयन करना पड़ता है ताकि किसी भी समुदाय में गलत संदेश न जाए और अनावश्यक विवाद पैदा न हो।


मुस्लिम पक्ष की दलील

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि वर्षों से शुक्रवार को नमाज अदा करने की व्यवस्था चली आ रही थी और इसे अचानक बदल दिया गया।

उन्होंने वर्ष 1997 की उस प्रशासनिक व्यवस्था का भी उल्लेख किया, जिसमें शुक्रवार को नमाज और विशेष अवसरों पर हिंदू समुदाय को पूजा की अनुमति देने की व्यवस्था लागू थी।

मुस्लिम पक्ष ने अदालत से अंतरिम राहत देने की मांग की।


सरकार का पक्ष

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि यदि सर्वोच्च अदालत अंतरिम व्यवस्था बनाना चाहती है तो सरकार सहयोग के लिए तैयार है।

साथ ही सरकार ने परिसर के ऐतिहासिक और धार्मिक पहलुओं से जुड़े अपने तर्क भी अदालत के समक्ष रखे।


रोजाना सुनवाई के संकेत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आवश्यकता हुई तो मामले की दैनिक आधार पर सुनवाई भी की जा सकती है ताकि विवाद का जल्द और संतुलित समाधान निकाला जा सके।

अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान व्यवस्था और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उचित पीठ के समक्ष जल्द सुनवाई सूचीबद्ध की जाएगी।

भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा सुनवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालत इस संवेदनशील मामले में संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान चाहती है। केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार से जवाब मांगने के साथ-साथ अदालत ने दोनों समुदायों के अधिकारों का सम्मान करने पर जोर दिया है। फिलहाल मामला विचाराधीन है और अंतिम फैसला विस्तृत सुनवाई के बाद ही आएगा। ऐसे में सभी पक्षों की नजर अब सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी है।

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