31 जुलाई से तमिलनाडु में नहीं मिलेगा चिकन? बिक्री बंद के ऐलान से मचा हड़कंप, जानिए पूरा विवाद और किस पर पड़ेगा सबसे बड़ा असर

चेन्नई: तमिलनाडु में 31 जुलाई से चिकन की बिक्री बंद होने की खबर ने उपभोक्ताओं और पोल्ट्री उद्योग दोनों के बीच हलचल मचा दी है। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि राज्य सरकार ने चिकन की बिक्री पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं लगाया है। दरअसल, तमिलनाडु चिकन ट्रेडर्स फेडरेशन ने अपने सदस्य व्यापारियों से 31 जुलाई से चिकन की बिक्री रोकने का आह्वान किया है।

फेडरेशन का कहना है कि कई ब्रॉयलर कंपनियां खाद्य सुरक्षा और पशु कल्याण से जुड़े आवश्यक नियमों का पालन नहीं कर रही हैं। यदि इन नियमों का पालन नहीं किया गया तो ग्राहकों तक अशुद्ध और संभावित रूप से असुरक्षित चिकन पहुंच सकता है। इसी मुद्दे को लेकर व्यापारियों ने यह कदम उठाने की घोषणा की है।

सरकारी बैन नहीं, व्यापारियों का विरोध

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई सरकारी आदेश नहीं है। चिकन बिक्री रोकने का फैसला तमिलनाडु चिकन ट्रेडर्स फेडरेशन की ओर से किया गया है। फेडरेशन ने अपने सदस्यों से अपील की है कि वे नियमों का पालन सुनिश्चित होने तक चिकन की बिक्री रोक दें।

इस फैसले को पड़ोसी केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के कई चिकन व्यापारियों का भी समर्थन मिला है। इससे आशंका जताई जा रही है कि यदि विवाद लंबा चला तो आसपास के क्षेत्रों में भी चिकन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

क्या है पूरा विवाद?

विवाद का केंद्र बिंदु ‘प्री-स्लॉटर फीड विदड्रॉल’ (Pre-Slaughter Feed Withdrawal) नियम है। इस नियम के अनुसार, ब्रॉयलर मुर्गों को बाजार या प्रोसेसिंग यूनिट भेजने से कम से कम 12 घंटे पहले दाना देना बंद कर देना चाहिए।

विशेषज्ञों के अनुसार ऐसा करने से मुर्गों का पाचन तंत्र काफी हद तक खाली हो जाता है। इससे वध प्रक्रिया के दौरान आंत फटने या मल के संपर्क में आने की संभावना कम होती है, जिससे मांस के दूषित होने का जोखिम घटता है।

क्यों जरूरी माना जाता है यह नियम?

पशु स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रक्रिया का पालन करने से चिकन में बैक्टीरिया संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है। विशेष रूप से साल्मोनेला (Salmonella), ई. कोलाई (E. coli) और कैंपिलोबैक्टर (Campylobacter) जैसे बैक्टीरिया से मांस के दूषित होने की आशंका घटती है।

इसके अलावा परिवहन के दौरान गंदगी कम फैलती है और चिकन की गुणवत्ता बेहतर बनी रहती है। यही कारण है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े दिशा-निर्देशों में इस नियम को महत्वपूर्ण माना जाता है।

व्यापारियों का आरोप क्या है?

तमिलनाडु चिकन ट्रेडर्स फेडरेशन का आरोप है कि कई ब्रॉयलर कंपनियां इस नियम का पालन नहीं कर रही हैं। फेडरेशन के अनुसार, मुर्गों को ट्रकों में लोड किए जाने तक लगातार दाना खिलाया जाता है।

व्यापारियों का दावा है कि ऐसा करने से प्रत्येक मुर्गे का वजन लगभग 100 ग्राम तक बढ़ जाता है। इससे कंपनियों को अधिक वजन के आधार पर अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलता है, लेकिन खाद्य सुरक्षा से जुड़े जोखिम भी बढ़ जाते हैं।

फेडरेशन का कहना है कि यदि इस तरह की प्रक्रिया जारी रही तो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

किन लोगों पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?

यदि फेडरेशन का आह्वान व्यापक स्तर पर सफल होता है, तो सबसे पहले इसका असर रोजाना चिकन खरीदने वाले उपभोक्ताओं पर दिखाई देगा। होटल, रेस्तरां, ढाबे, कैटरिंग व्यवसाय और फास्ट फूड उद्योग को भी चिकन की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है।

इसके अलावा छोटे चिकन विक्रेता, पोल्ट्री फार्म संचालक, थोक व्यापारी और सप्लाई चेन से जुड़े हजारों लोगों की आय भी प्रभावित हो सकती है।

यदि विवाद लंबे समय तक चलता है तो बाजार में चिकन की उपलब्धता कम होने और कीमतों में उतार-चढ़ाव की संभावना भी बढ़ सकती है।

क्या होगा आगे?

फिलहाल व्यापारियों की मांग है कि सभी ब्रॉयलर कंपनियां सरकारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करें। दूसरी ओर उद्योग जगत की प्रतिक्रिया और संबंधित विभागों की कार्रवाई पर सभी की नजर बनी हुई है।

यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बन जाती है तो चिकन की आपूर्ति सामान्य हो सकती है। लेकिन यदि विवाद जारी रहता है तो इसका असर पोल्ट्री उद्योग के साथ-साथ लाखों उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस समय उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह व्यापारिक विरोध है, न कि राज्य सरकार द्वारा लगाया गया कानूनी प्रतिबंध।

तमिलनाडु में 31 जुलाई से चिकन बिक्री बंद करने की घोषणा ने पोल्ट्री उद्योग और उपभोक्ताओं दोनों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि यह सरकारी प्रतिबंध नहीं, बल्कि व्यापारियों का विरोध है। विवाद का मुख्य कारण ब्रॉयलर मुर्गों के लिए निर्धारित ‘प्री-स्लॉटर फीड विदड्रॉल’ नियम का कथित उल्लंघन है। आने वाले दिनों में सरकार, उद्योग और व्यापारियों के बीच होने वाली बातचीत इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।

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