Himalayan Glacier Crisis: हिमालय के ग्लेशियर पिघले तो डूब जाएगी अर्थव्यवस्था? भारत की 20% GDP पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

नई दिल्ली। हिमालय को भारत की प्राकृतिक सुरक्षा, जल व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने इस पूरे क्षेत्र के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। हालिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हिमालयी ग्लेशियर पिछले दशक की तुलना में करीब 65 प्रतिशत अधिक तेजी से पिघल रहे हैं।

यह बदलाव केवल पहाड़ों तक सीमित समस्या नहीं है। हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत के बड़े हिस्से की कृषि, पेयजल, बिजली उत्पादन और पर्यटन व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने की समस्या को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

भारत की 20% GDP पर क्यों मंडरा रहा खतरा?

हिमालय का प्राकृतिक जलतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों को सहारा देता है। गेहूं, चावल और चाय की खेती, पनबिजली उत्पादन और धार्मिक पर्यटन जैसी गतिविधियां हिमालय से आने वाले जल पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी जलतंत्र भारत की लगभग 20 प्रतिशत GDP को आधार प्रदान करने वाली आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा है।

इसलिए ग्लेशियरों में तेजी से होने वाला बदलाव केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है। इसका असर पानी की उपलब्धता, खेती की उत्पादकता, बिजली उत्पादन, पर्यटन और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है।

हालांकि, यह कहना कि ग्लेशियर पिघलने से भारत की पूरी 20 प्रतिशत GDP सीधे ‘बह जाएगी’, एक सरलीकृत निष्कर्ष होगा। रिपोर्ट का संकेत मुख्य रूप से यह है कि हिमालय पर निर्भर आर्थिक गतिविधियों को जलवायु परिवर्तन से बड़ा जोखिम पैदा हो सकता है।

56 ग्लेशियर झीलें बेहद संवेदनशील

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान के साथ ग्लेशियर झीलों का आकार और संख्या भी चिंता का विषय बन रही है। ऐसी झीलों में अचानक पानी बढ़ने या बांध जैसी प्राकृतिक संरचना टूटने की स्थिति में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) का खतरा पैदा हो सकता है।

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया है। इनमें 56 झीलों को अति-उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है।

केंद्रीय जल आयोग हिमालयी नदी बेसिनों में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,485 झीलों की निगरानी कर रहा है। इसका उद्देश्य संभावित खतरे की पहचान करना और समय रहते आपदा प्रबंधन की तैयारी करना है।

सिक्किम और उत्तराखंड की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

हिमालयी क्षेत्र में अचानक आने वाली आपदाओं का खतरा पहले भी सामने आ चुका है। 2023 में सिक्किम में ग्लेशियल झील से जुड़ी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई थी। इससे पहले 2021 में उत्तराखंड की ऋषिगंगा और धौलीगंगा घाटियों में आई विनाशकारी बाढ़ ने भी हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया था।

ऐसी घटनाएं बताती हैं कि ग्लेशियरों में बदलाव का असर केवल पानी की उपलब्धता पर नहीं पड़ता। सड़क, पुल, बिजली परियोजनाएं, गांव और पर्यटन केंद्र भी अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की चपेट में आ सकते हैं।

Black Carbon बन रहा बड़ा खतरा

हिमालयी ग्लेशियरों के लिए केवल बढ़ता तापमान ही चिंता का कारण नहीं है। रिपोर्ट में ब्लैक कार्बन यानी कालिख के प्रभाव को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

ब्लैक कार्बन मुख्य रूप से ईंधन जलने और औद्योगिक गतिविधियों से निकलने वाले सूक्ष्म कणों का हिस्सा है। जब यह बर्फ और ग्लेशियर की सतह पर जमा होता है तो सूर्य की गर्मी को अधिक सोख सकता है, जिससे बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लेशियरों के पिघलाव में ब्लैक कार्बन का योगदान लगभग एक-तिहाई तक हो सकता है। ऐसे में मैदानी क्षेत्रों में होने वाला प्रदूषण हिमालयी पर्यावरण को भी प्रभावित कर सकता है।

सबसे बड़ी समस्या है Monitoring Gap

हिमालय-काराकोरम क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर मौजूद हैं, लेकिन सभी की लगातार और विस्तृत निगरानी नहीं हो पा रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक अनुमानित करीब 40 हजार ग्लेशियरों में से केवल 21 पर ही विस्तृत और निरंतर निगरानी की जा रही है। इतने बड़े क्षेत्र की तुलना में यह संख्या बेहद कम है।

विशेषज्ञों के लिए यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है, क्योंकि ग्लेशियरों के आकार, गति, बर्फ की मोटाई और आसपास बनने वाली झीलों में बदलाव की नियमित जानकारी आपदा की पहले से पहचान करने में मदद कर सकती है।

पर्यटन मॉडल में बदलाव की जरूरत

हिमालयी राज्यों की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की बड़ी भूमिका है। धार्मिक स्थलों, ट्रैकिंग, पहाड़ी पर्यटन और प्राकृतिक स्थलों के कारण बड़ी संख्या में लोग हिमालयी क्षेत्रों का रुख करते हैं।

रिपोर्ट में पर्यटन के मौजूदा मॉडल को बदलने पर भी जोर दिया गया है। केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के बजाय स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक लाभ, पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्र की वहन क्षमता को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है।

अत्यधिक निर्माण, कचरा, पानी पर दबाव और अनियोजित पर्यटन हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त बोझ डाल सकते हैं।

समाधान के लिए क्या करना होगा?

रिपोर्ट में संकट से निपटने के लिए कई स्तरों पर कदम उठाने की जरूरत बताई गई है। इनमें ब्लैक कार्बन उत्सर्जन कम करना, ग्लेशियरों की निगरानी बढ़ाना, ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत करना शामिल हैं।

इसके साथ ही भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में सीमा-पार सहयोग भी जरूरी माना जाता है। नदियां और ग्लेशियर राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानते, इसलिए किसी एक देश के प्रयास से पूरे क्षेत्र का संकट हल करना मुश्किल होगा।

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