ज्ञानेश कुमार के बाद अब एक और EC अधिकारी पर सवाल, मनीष गर्ग के इस फैसले से क्यों मचा विवाद?

मुख्य चुनाव: आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहा विवाद अभी पूरी तरह थमा भी नहीं है कि चुनाव आयोग के भीतर एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी से जुड़ा मामला चर्चा में आ गया है। इस बार सवाल वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग की ओर से जुलाई में जारी किए गए एक कार्य-वितरण आदेश को लेकर उठा है।

रिपोर्टों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई थी। दोनों ने जुलाई के अंत में कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन को अलग-अलग पत्र भी भेजे थे। हालांकि, इन पत्रों की पूरी सामग्री सार्वजनिक नहीं हुई है।

आखिर मनीष गर्ग के आदेश में क्या था?

विवाद का केंद्र 28 जुलाई 2026 का कार्य-वितरण आदेश बताया जा रहा है। उस समय मनीष गर्ग चुनाव आयोग में प्रशासनिक मामलों की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। रिपोर्टों के अनुसार, इस आदेश में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच प्रशासनिक, आईटी और शिकायत संबंधी जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया था।

इससे पहले उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के पास चुनावी रोल, आईटी और शिकायत/जन शिकायत प्रणाली से जुड़े कामों की जिम्मेदारी थी। नए आदेश में आईटी और शिकायत से जुड़ी जिम्मेदारियों की रिपोर्टिंग व्यवस्था में बदलाव किया गया और आईटी महानिदेशक सीमा खन्ना की भूमिका सीधे आयोग तक पहुंचने वाली संरचना में बदल गई।

यही बदलाव बाद में विवाद का मुख्य बिंदु बना।

दो चुनाव आयुक्तों ने क्यों जताई आपत्ति?

रिपोर्टों के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने बदली हुई कार्य-वितरण व्यवस्था पर सवाल उठाए। आपत्ति केवल जिम्मेदारियों के बदलाव को लेकर नहीं थी, बल्कि इस बात पर भी सवाल था कि यह आदेश किस प्रक्रिया के तहत जारी हुआ।

कुछ रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि चुनाव आयोग में ऐसे कार्य-वितरण आदेश आम तौर पर पूरी आयोगीय व्यवस्था के सामने रखे जाते हैं और अंतिम स्वीकृति आयोग स्तर पर होती है। 28 जुलाई के आदेश को लेकर इसी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए।

इसके बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र भेजे। हालांकि, पत्रों की पूरी सामग्री सार्वजनिक नहीं है, इसलिए उसमें कही गई हर बात को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

संजय कुमार की वापसी से मामला और महत्वपूर्ण हुआ

विवाद के बीच एक और घटनाक्रम सामने आया। अगस्त 2026 में संजय कुमार अपने मूल कैडर में वापस लौट गए। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उनकी वापसी व्यक्तिगत कारणों से हुई थी।

उनके जाने के बाद आईटी विभाग से जुड़ी जिम्मेदारियों की स्थिति और महत्वपूर्ण हो गई। रिपोर्टों के मुताबिक, मनीष गर्ग के पास अब उन जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा आ गया और इससे जुलाई के कार्य-वितरण आदेश को लेकर पहले उठे सवाल फिर चर्चा में आ गए।

चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?

विवाद बढ़ने के बाद चुनाव आयोग की ओर से स्पष्टीकरण दिया गया। आयोग ने इसे किसी बड़े नीतिगत मतभेद के बजाय प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी के आचरण और कामकाज से जुड़ा मामला बताया।

आयोग के अनुसार, संबंधित आदेश पूरी तरह लागू नहीं हुआ था और आईटी विभाग पर उप चुनाव आयुक्त की निगरानी जारी रही। आयोग ने यह भी कहा कि उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं और अलग-अलग अधिकारियों की टिप्पणियां निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती हैं।

इसका अर्थ यह है कि सामने आए दस्तावेजों और आपत्तियों को सीधे तौर पर आयोग के अंतिम फैसलों में किसी अवैधता का प्रमाण मानना अभी उचित नहीं होगा।

विवाद का चुनावी प्रक्रिया से क्या संबंध है?

चुनाव आयोग देश की चुनावी व्यवस्था में मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम, मतदान प्रक्रिया और तकनीकी प्रणालियों से जुड़े महत्वपूर्ण कार्य करता है। ऐसे में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों और रिपोर्टिंग चैनल में बदलाव केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता।

इसी वजह से जुलाई का यह कार्य-वितरण आदेश उस समय ज्यादा चर्चा में आया जब आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को लेकर अलग से सवाल उठ रहे थे। एक रिपोर्ट के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर विभिन्न फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। आयोग ने इन टिप्पणियों को अपनी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बताया है।

मनीष गर्ग विवाद में अब आगे क्या?

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह मामला मुख्य रूप से कार्य-वितरण, प्रशासनिक प्रक्रिया और अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों की संरचना से जुड़ा है। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से भेजे गए पत्रों की पूरी सामग्री सार्वजनिक नहीं होने के कारण विवाद के सभी पहलुओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

साथ ही, मनीष गर्ग पर लगाए गए किसी भी आरोप को स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों में उनके पक्ष से यह बात सामने आई है कि फैसला पदक्रम और अधिकारियों की वरिष्ठता से जुड़े प्रशासनिक पहलू के कारण लिया गया था।

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