तिब्बत: में आए शक्तिशाली भूकंप ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र की भूकंपीय संवेदनशीलता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। 22 अक्टूबर 2026 की रात चीन के तिब्बत क्षेत्र में 7.0 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। इसके बाद कई मकानों के ढहने, लोगों के घायल होने और राहत-बचाव अभियान चलाए जाने की खबर सामने आई। इस घटना ने भारत में भी यह सवाल खड़ा किया है कि हिमालय के आसपास आने वाले बड़े भूकंपों का असर देश के किन हिस्सों में महसूस हो सकता है।
23 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, भूकंप में कम से कम 16 लोगों की मौत हुई थी। घायलों की संख्या अलग-अलग शुरुआती रिपोर्टों में अलग बताई गई। सैकड़ों मकानों को नुकसान पहुंचने की खबर भी सामने आई। ऐसे में नुकसान के आंकड़ों को अंतिम मानने के बजाय आधिकारिक अपडेट के साथ देखना जरूरी है।
भारत के लिए इस घटना का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय रूप से सक्रिय है और यहां भूकंप का खतरा लंबे समय से वैज्ञानिक अध्ययन का विषय रहा है।
कब और कहां आया भूकंप?
चीन के तिब्बत क्षेत्र के नागकू इलाके के पास 22 अक्टूबर की रात स्थानीय समय के अनुसार लगभग 10:33 बजे शक्तिशाली भूकंप आया। भारत के नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी ने भी इस घटना को 7.0 तीव्रता के भूकंप के रूप में दर्ज किया।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, भूकंप का केंद्र उत्तरी तिब्बत के एक पहाड़ी और अपेक्षाकृत कम आबादी वाले क्षेत्र में था। इसकी गहराई को लेकर अलग-अलग एजेंसियों के आंकड़ों में अंतर देखने को मिला। चीन के भूकंप नेटवर्क केंद्र ने इसकी गहराई लगभग 10 किलोमीटर बताई, जबकि भारत की एजेंसी ने लगभग 15 किलोमीटर दर्ज की।
भूकंप के बाद आसपास के क्षेत्र में छोटे झटके भी रिकॉर्ड किए गए। ऐसी घटनाओं को आफ्टरशॉक कहा जाता है। मुख्य भूकंप के बाद आफ्टरशॉक आ सकते हैं, लेकिन उनके समय और तीव्रता का सटीक अनुमान लगाना संभव नहीं होता।
जान-माल का कितना नुकसान हुआ?
शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, तिब्बत के प्रभावित क्षेत्र में कम से कम 16 लोगों की मौत हुई और कई लोग घायल हुए। स्थानीय अधिकारियों की जानकारी के आधार पर सैकड़ों मकानों के ढहने या क्षतिग्रस्त होने की खबर आई।
दूरस्थ और ऊंचाई वाले क्षेत्र में राहत अभियान चलाना आसान नहीं होता। प्रभावित इलाकों तक पहुंचने, इमारतों की स्थिति का आकलन करने और जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाने में समय लग सकता है। कुछ स्थानों पर संचार और परिवहन व्यवस्था प्रभावित होने की भी रिपोर्ट आई।
राहत-बचाव दलों को पहले उन स्थानों पर ध्यान देना होता है जहां लोगों के फंसे होने या तत्काल मदद की जरूरत होने की आशंका हो। इसके बाद क्षतिग्रस्त इमारतों, सड़कों और अन्य बुनियादी सुविधाओं का आकलन किया जाता है।
हालांकि, किसी आपदा में नुकसान का वास्तविक स्तर शुरुआती घंटों में पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाता। इसलिए मृतकों, घायलों और क्षतिग्रस्त मकानों की संख्या में बाद में बदलाव संभव है।

भारत के लिए कितना बड़ा खतरा?
तिब्बत में भूकंप आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत में भी उसी तीव्रता का भूकंप आएगा। किसी भूकंप का असर उसके केंद्र, गहराई, भूगर्भीय संरचना, जमीन की प्रकृति और संबंधित स्थान से दूरी जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
भारत के लिए मुख्य चिंता हिमालयी क्षेत्र की व्यापक भूकंपीय संवेदनशीलता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश तक कई पहाड़ी इलाके भूकंप के जोखिम वाले क्षेत्रों में आते हैं।
भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में संसद से जुड़े एक आधिकारिक जवाब में बताया था कि अद्यतन भूकंपीय वर्गीकरण में पूरा हिमालयी चाप सबसे उच्च जोखिम वाली श्रेणी, जोन VI, में रखा गया है।
इसका मतलब यह है कि हिमालयी क्षेत्रों में भूकंप के खतरे को गंभीरता से लेना जरूरी है। लेकिन केवल तिब्बत में आए एक भूकंप के आधार पर भारत में किसी आगामी बड़े भूकंप की तारीख, स्थान या तीव्रता बताना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है।
आखिर हिमालय में बार-बार भूकंप क्यों आते हैं?
हिमालय की भूगर्भीय बनावट भारतीय और यूरेशियाई टेक्टोनिक प्लेटों की परस्पर गति से जुड़ी हुई है। भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियाई प्लेट के साथ टकराव और दबाव की प्रक्रिया में है। इस गतिविधि से पृथ्वी की ऊपरी परत में तनाव जमा हो सकता है।
जब किसी भ्रंश या फॉल्ट के आसपास जमा तनाव अचानक मुक्त होता है, तो भूकंपीय तरंगें पैदा होती हैं और जमीन हिलने लगती है। इसी कारण हिमालय और तिब्बती पठार के आसपास का क्षेत्र भूकंप विज्ञानियों के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, भूगर्भीय दबाव और प्लेटों की गति का अध्ययन भूकंप के जोखिम को समझने में मदद करता है, लेकिन अभी तक किसी बड़े भूकंप का सटीक दिन और समय बताने का भरोसेमंद तरीका उपलब्ध नहीं है।
क्या आफ्टरशॉक से भी नुकसान हो सकता है?
बड़े भूकंप के बाद छोटे या कभी-कभी अपेक्षाकृत तेज झटके आ सकते हैं। यदि कोई इमारत पहले ही कमजोर हो चुकी हो, तो बाद के झटके उसे और नुकसान पहुंचा सकते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में भूकंप के कारण पत्थर गिरने, भूस्खलन या सड़कों पर मलबा आने की आशंका भी हो सकती है।
इसीलिए प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन और राहत एजेंसियों के निर्देशों का पालन करना जरूरी है। क्षतिग्रस्त इमारतों में बिना सुरक्षा जांच के वापस जाना जोखिम भरा हो सकता है।
भारत में भी भूकंप महसूस होने पर घबराने के बजाय सुरक्षित स्थान पर जाना, खिड़कियों और भारी वस्तुओं से दूरी रखना तथा आधिकारिक आपदा प्रबंधन निर्देशों का पालन करना उपयोगी है।
भारत को किस बात पर ध्यान देना चाहिए?
तिब्बत में आया भूकंप भारत के लिए किसी निश्चित आगामी आपदा की भविष्यवाणी नहीं करता, लेकिन यह आपदा-तैयारी के महत्व को जरूर सामने लाता है। हिमालयी राज्यों में भूकंप-रोधी निर्माण, पुराने भवनों की सुरक्षा जांच, आपातकालीन संचार व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर जागरूकता महत्वपूर्ण हैं।
भूकंप के दौरान नुकसान केवल उसकी तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। कमजोर निर्माण, घनी आबादी, जमीन की प्रकृति और बचाव व्यवस्था भी परिणामों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए जोखिम कम करने के लिए भवन निर्माण मानकों और स्थानीय आपदा प्रबंधन योजनाओं पर ध्यान देना जरूरी है।



