धनबाद: अदाणी समूह के प्रमुख गौतम अदाणी ने पश्चिमी देशों के कार्बन उत्सर्जन पर दोहरे मानक को लेकर कड़ा निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि वे देश जो इतिहास में सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक रहे हैं, अब कथात्मक कहानियों के जरिए भारत जैसे विकासशील देशों को कार्बन कटौती पर व्याख्यान देते हैं। अदाणी ने इस स्थिति को ‘नैरेटिव कोलोनाइजेशन’ (कथात्मक उपनिवेशवाद) करार दिया और इसे लेकर सतर्क रहने की आवश्यकता जताई।
आईआईटी (आईएसएम) धनबाद के शताब्दी समारोह में बोलते हुए अदाणी ने कहा कि भारत को अपने विकास का मार्ग स्वयं तय करना होगा, खासकर जब वैश्विक गठबंधन टूट रहे हैं और दुनिया के प्रमुख देश केवल अपने हित में काम कर रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि भारत को बाहरी दबावों के चलते विकास प्राथमिकताओं पर समझौता नहीं करना चाहिए।
भारत की ऊर्जा खपत और कार्बन उत्सर्जन
अदाणी ने भारत के ऊर्जा उपयोग और कार्बन उत्सर्जन का तथ्य साझा किया:
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भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है, लेकिन प्रति व्यक्ति बिजली खपत केवल 1,400 किलोवाट घंटे प्रति वर्ष है, जो वैश्विक औसत के आधे से भी कम है।
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अमेरिका का यह आंकड़ा भारत से लगभग 10 गुना अधिक है और यूरोप का 5 गुना अधिक।
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कुल कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन में भारत तीसरे स्थान पर है, लेकिन प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2 टन से कम है, जबकि अमेरिका में 14 टन, चीन में 9 टन और यूरोप में 6 टन है।
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200 वर्षों की औद्योगिक गतिविधि में भारत ने कुल वैश्विक उत्सर्जन में केवल 4 प्रतिशत योगदान दिया, जबकि अमेरिका ने 19%, चीन ने 20% और यूरोप ने 13% योगदान किया।
अदाणी ने अंतरराष्ट्रीय स्थिरता रैंकिंग पर भी सवाल उठाए और कहा कि ये रैंकिंग विकासशील देशों को कोयले के निरंतर उपयोग के लिए दंडित करती हैं, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति खपत बेहद कम है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत को अपनी बेस-लोड जीवाश्म क्षमता का विस्तार करना होगा ताकि ऊर्जा की कमी दूर हो सके।
वैश्विक परिदृश्य और संप्रभुता
अदाणी ने वैश्विक स्थिति का भी वर्णन किया:
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सहयोग वाले वैश्विक व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं का युग समाप्त हो गया है।
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जो राष्ट्र पहले मजबूत गठबंधनों का हिस्सा थे, अब पीछे हट रहे हैं।
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रेयर अर्थ, सेमीकंडक्टर, टैरिफ और व्यापारिक संधियों के टूटने की लड़ाइयां सामान्य हो गई हैं।
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नाटो, विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र जैसी प्रमुख संस्थाओं को भी अपने ढांचों और सहभागिता नियमों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
उन्होंने संप्रभुता को बाहरी प्रभाव और नियंत्रण से मुक्त, स्वयं पर शासन करने की क्षमता के रूप में परिभाषित किया।
पश्चिमी देशों के डबल स्टैंडर्ड पर तंज
अदाणी ने कहा कि वे देश जिन्होंने संसाधनों को लूटा, महाद्वीपों को गुलाम बनाया और दो शताब्दियों तक जीवाश्म ईंधन जलाया, अब नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं। यह विरोधाभास है कि जिन लोगों ने पृथ्वी को गर्म किया, वे अब यह नियम बनाना चाहते हैं कि पृथ्वी को कैसे ठंडा किया जाए।
अदाणी ने चेताया कि यदि भारत अपनी विकास धारणाओं को नियंत्रित नहीं करेगा, तो उसकी वृद्धि को अपराध घोषित किया जाएगा और विकास की आकांक्षाओं को अवैध घोषित किया जा सकता है।
गौतम अदाणी ने पश्चिमी देशों के डबल स्टैंडर्ड और कथात्मक उपनिवेशवाद के युग पर चिंता जताते हुए भारत को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति अपनाने की आवश्यकता बताई। उन्होंने जोर दिया कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन अत्यंत कम है और देश को वैश्विक दबावों में फंसे बिना विकास का मार्ग स्वयं चुनना चाहिए।



