नई दिल्ली: प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गंभीर आपराधिक मामलों में लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहने की स्थिति में पद से हटाने का प्रावधान प्रस्तावित करने वाले 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर फिलहाल अंतिम फैसला टल गया है। इस विधेयक की समीक्षा कर रही संसद की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने अपनी मसौदा रिपोर्ट को अभी स्वीकार नहीं किया है।
समिति ने माना कि यह विषय संवैधानिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी देने से पहले सभी पहलुओं पर और अधिक विचार-विमर्श तथा संबंधित पक्षों से अतिरिक्त परामर्श आवश्यक है।
क्यों टाली गई JPC रिपोर्ट?
शुक्रवार को आयोजित समिति की बैठक में मसौदा रिपोर्ट की विभिन्न सिफारिशों पर चर्चा की गई। बैठक के दौरान कई सदस्यों ने सुझाव दिया कि रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए।
समिति की अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने बताया कि सदस्यों की सहमति से रिपोर्ट को फिलहाल स्वीकार नहीं किया गया है और आगे की प्रक्रिया बाद में पूरी की जाएगी।
उन्होंने कहा कि समिति चाहती है कि सभी पक्षों की राय सुनने के बाद ही अंतिम सिफारिश संसद के समक्ष रखी जाए।
क्या है 130वां संविधान संशोधन विधेयक?
प्रस्तावित 130वें संविधान संशोधन विधेयक का उद्देश्य यह व्यवस्था करना है कि यदि प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री या किसी राज्य के मुख्यमंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहते हैं, तो ऐसी स्थिति में उनके पद पर बने रहने को लेकर स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान बनाया जा सके।
हालांकि, यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इस पर अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
मसौदा रिपोर्ट में क्या शामिल था?
संयुक्त संसदीय समिति की मसौदा रिपोर्ट में कुल पांच प्रमुख सिफारिशें शामिल थीं। यह मसौदा सभी समिति सदस्यों के बीच पहले ही विचार के लिए वितरित किया जा चुका था।
बैठक के दौरान प्रत्येक सिफारिश पर अलग-अलग चर्चा और मतदान की प्रक्रिया चल रही थी, लेकिन सदस्यों ने महसूस किया कि विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए जल्दबाजी उचित नहीं होगी।
ओवैसी और सुप्रिया सुले ने क्यों वापस लिया असहमति नोट?
बैठक से पहले एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी और एनसीपी (शरद पवार) सांसद सुप्रिया सुले ने मसौदा रिपोर्ट पर अपने असहमति नोट (Dissent Notes) समिति को सौंपे थे।
लेकिन जब समिति ने रिपोर्ट को स्वीकार करने की प्रक्रिया स्थगित करने का निर्णय लिया, तो दोनों नेताओं ने अपने असहमति नोट वापस ले लिए।
इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने समिति की सिफारिशों का समर्थन कर दिया है, बल्कि रिपोर्ट पर आगे चर्चा होने तक उन्होंने अपने औपचारिक विरोध को फिलहाल वापस रखने का फैसला किया।
समिति अध्यक्ष ने क्या कहा?
समिति की अध्यक्ष अपराजिता सारंगी ने कहा कि संयुक्त संसदीय समिति का उद्देश्य जल्दबाजी में कोई निर्णय लेना नहीं है।
उन्होंने बताया कि समिति सर्वसम्मति से इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि संबंधित हितधारकों, विशेषज्ञों और अन्य पक्षों के साथ और व्यापक चर्चा की जानी चाहिए। इसके बाद ही अंतिम रिपोर्ट तैयार होगी।
आगे क्या होगा?
अब संयुक्त संसदीय समिति आगामी बैठकों में इस मसौदा रिपोर्ट पर फिर से विचार करेगी।
संभव है कि—
- अतिरिक्त विशेषज्ञों से राय ली जाए।
- कानूनी विशेषज्ञों और संवैधानिक जानकारों से सुझाव मांगे जाएं।
- रिपोर्ट में संशोधन किए जाएं।
- इसके बाद अंतिम रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत की जाए।
राजनीतिक महत्व क्यों है?
यह प्रस्ताव सीधे देश के सर्वोच्च निर्वाचित पदों से जुड़ा है। इसलिए इसके संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक प्रभाव काफी व्यापक माने जा रहे हैं।
यदि भविष्य में इस प्रकार का कोई संशोधन लागू होता है, तो इससे प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और मुख्यमंत्रियों के पद से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।
हालांकि फिलहाल यह पूरा मामला समिति के विचाराधीन है और अभी किसी भी प्रकार का संवैधानिक संशोधन लागू नहीं हुआ है।

