सुप्रीम कोर्ट की दोटूक टिप्पणी: प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कानून से ऊपर नहीं! दिल्ली में मेट्रो, इंटरनेट और हिरासत पर भी दिए अहम निर्देश

नई दिल्ली: दिल्ली में सीजेपी (कॉकरोच जनता पार्टी) के प्रदर्शन को लेकर लगाए गए प्रतिबंधों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के प्रदर्शन करने के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन प्रदर्शन का तरीका कानून और पुलिस एक्ट के दायरे में होना चाहिए। मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कानून में निर्धारित प्रक्रिया से अलग होकर नहीं किया जा सकता।

रविवार, 11 अक्टूबर 2026 को हुई विशेष सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट सेवाओं और लोगों की आवाजाही को लेकर कई अहम निर्देश दिए। साथ ही, पिछले आदेश के कथित उल्लंघन को लेकर केंद्रीय गृह सचिव, दिल्ली पुलिस आयुक्त और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) के अध्यक्ष को नोटिस जारी किए। मामले में अगली सुनवाई 13 अक्टूबर को निर्धारित है।

प्रदर्शन के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नागरिकों को प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे से बाहर नहीं हो सकता। अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था और प्रतिबंधों पर सवाल उठाए गए हैं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिबंधित क्षेत्र से बाहर भी लोगों को हिरासत में लिया गया और उनकी आवाजाही में बाधा पहुंचाई गई।

अदालत ने इस पूरे मामले में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जरूरत और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन पर जोर दिया।

मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं को लेकर क्या निर्देश दिए?

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि दिल्ली मेट्रो सामान्य समय-सारिणी के अनुसार संचालित हो और रेल सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने जैसी स्थिति न बने। अदालत ने यह भी कहा कि इंटरनेट सेवाएं बाधित नहीं होनी चाहिए और लोगों की आवाजाही कानून के अनुरूप सुनिश्चित की जाए।

पीठ ने स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं, लेकिन उनकी वजह से आम नागरिकों को अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने सड़कों पर लगाए गए बैरिकेड की समीक्षा करने और यातायात तथा सार्वजनिक आवागमन को सुचारु बनाने पर भी जोर दिया।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाओं को निर्बाध रखने का निर्देश संबंधित कानूनों के तहत अधिकारियों को मिली वैधानिक शक्तियों को समाप्त नहीं करता। यानी प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई भी कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए।

गृह सचिव और पुलिस आयुक्त को नोटिस

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और डीएमआरसी अध्यक्ष को नोटिस जारी किए। अदालत ने उनसे 13 अक्टूबर 2026 तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने और पहले दिए गए निर्देशों के अनुपालन की जानकारी देने को कहा।

यह कार्रवाई उस याचिका के संदर्भ में की गई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि प्रदर्शन से पहले मेट्रो और रेल सेवाओं को लेकर दिए गए अदालत के आदेश का पालन नहीं किया गया। पीठ ने प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला बनने की संभावना पर टिप्पणी की, लेकिन संबंधित अधिकारियों को फिलहाल व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट दी।

इस मामले में अंतिम निष्कर्ष अधिकारियों के जवाब और अदालत के आगे के विचार के बाद ही स्पष्ट होगा।

45 मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध और हिरासत का मुद्दा

सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने दावा किया कि प्रदर्शन के समय 45 मेट्रो स्टेशनों पर यात्रियों के प्रवेश और निकास पर रोक लगाई गई थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जंतर-मंतर के निर्धारित क्षेत्र से बाहर मौजूद लोगों को हिरासत में लिया गया।

वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अदालत में दावा किया कि दिल्ली में लगभग 45 हिरासत केंद्र बनाए गए और विपक्षी नेताओं सहित करीब 7,000 लोगों को हिरासत में लिया गया। ये आंकड़े सुनवाई के दौरान वकीलों की ओर से रखे गए दावे थे।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 10 अक्टूबर को दिल्ली के कुल 303 मेट्रो स्टेशनों में से 45 पर ही प्रवेश और निकास संबंधी प्रतिबंध लगाए गए थे। उन्होंने यह भी बताया कि इंटरनेट कनेक्टिविटी बहाल कर दी गई थी और सभी मेट्रो स्टेशन चालू थे।

इस तरह अदालत के सामने प्रतिबंधों की सीमा और उनके क्रियान्वयन को लेकर दोनों पक्षों की दलीलें आईं।

शांतिपूर्ण लोगों की हिरासत पर अदालत सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। पीठ ने विशेष रूप से उन लोगों का जिक्र किया, जो उस क्षेत्र के बाहर एकत्र हुए थे जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू किए गए थे।

अदालत ने यह भी कहा कि किसी सीमित क्षेत्र में लगाए गए प्रतिबंधों को आधार बनाकर दूर-दराज के इलाकों में लोगों को हिरासत में लेने को उचित नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, अदालत परिसर के आसपास धारा 163 लागू होने की जानकारी देने वाले बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया गया, यदि वे अब तक लगे हुए हों। इसका उद्देश्य नागरिकों और वकीलों की न्याय तक पहुंच को लेकर अनावश्यक आशंका दूर करना था।

पीठ ने यह सुनिश्चित करने को भी कहा कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में बाधा न आए।

अब 13 अक्टूबर की सुनवाई पर नजर

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद अब सबकी नजर 13 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई पर है। इस दौरान अधिकारियों के जवाब, पूर्व आदेशों के अनुपालन और प्रदर्शन के दौरान लगाए गए प्रतिबंधों से जुड़े सवालों पर आगे विचार हो सकता है।

यह मामला केवल एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में शांतिपूर्ण विरोध का संवैधानिक अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी और कानून के तहत सरकारी शक्तियों के इस्तेमाल की सीमाएं भी हैं। अदालत के अगले कदम से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दिल्ली में लगाए गए प्रतिबंधों और कथित हिरासत के मामलों पर आगे क्या कार्रवाई होती है।

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