नवाबों: के शहर लखनऊ में जैसे ही मोहर्रम का चांद दिखाई देता है, पूरे शहर का माहौल बदल जाता है। ‘या हुसैन’ की सदाओं के बीच इमामबाड़ों, घरों और गलियों में अकीदत और गम का माहौल नजर आने लगता है। पुराने लखनऊ में मोहर्रम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
शिया समुदाय के लोग अपने घरों और इमामबाड़ों में ताजिया स्थापित करते हैं। वहीं मोहर्रम की पहली तारीख को निकलने वाला शाही जरी ताजिया का जुलूस आज भी शहर की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है।
₹300 से ₹3 लाख तक की ताजिया
लखनऊ में बनने वाली ताजियों की कीमत उनके आकार, डिजाइन और निर्माण सामग्री के आधार पर तय होती है। साधारण कागज और लकड़ी से बनी ताजियां जहां ₹300 से शुरू होती हैं, वहीं विशेष नक्काशी, सजावट और मोम से तैयार शाही जरी ताजिया की लागत ₹3 लाख तक पहुंच जाती है।
बाजार में छोटे घरों के लिए छोटी ताजियां और बड़े इमामबाड़ों व संगठनों के लिए विशाल आकार की ताजियां उपलब्ध रहती हैं। कुछ ताजियां पूरी तरह लकड़ी की नक्काशीदार होती हैं, जबकि कई चांदी और मोम से भी बनाई जाती हैं।
187 साल पुरानी परंपरा का दावा
अवध के इतिहासकारों और नवाबी परिवार से जुड़े लोगों के अनुसार लखनऊ में ताजिया जुलूस की परंपरा लगभग 187 साल पुरानी है।
नवाबीन-ए-अवध के वंशज नवाब मसूद अब्दुल्ला बताते हैं कि अवध के तीसरे नवाब मोहम्मद अली शाह ने वर्ष 1839 में बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक शाही जरी ताजिया के जुलूस की शुरुआत कराई थी।
आज भी उसी परंपरा का निर्वहन किया जाता है और हजारों लोग इस ऐतिहासिक जुलूस में शामिल होकर श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
एक ताजिया बनाने में लगते हैं तीन महीने
छोटे इमामबाड़े के लिए तैयार होने वाली शाही जरी ताजिया अपने आप में एक अद्भुत कलाकृति होती है।
कारीगर वसीम अली बताते हैं कि 22 फीट ऊंची और लगभग 10 फीट चौड़ी शाही जरी ताजिया को तैयार करने में करीब तीन महीने का समय लगता है। इसे बनाने में ढाई क्विंटल से अधिक मोम का इस्तेमाल किया जाता है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1999 से उनका परिवार इस ताजिया को तैयार कर रहा है। एक ताजिया बनाने में लगभग 25 लोग लगातार काम करते हैं और इसकी लागत करीब 3 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
लकड़ी की ताजियों की विदेशों तक मांग
लखनऊ की नक्काशीदार लकड़ी की ताजियां देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बना चुकी हैं।
घंटाघर क्षेत्र के व्यापारी जफर अली बताते हैं कि उनके यहां तैयार होने वाली लकड़ी की ताजियां और इमामबाड़े 2 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक की कीमत में बिकते हैं।
यह उनका पुश्तैनी व्यवसाय है और परिवार की कई पीढ़ियां इस कला से जुड़ी रही हैं। उन्होंने बताया कि पिछले वर्षों में न्यूयॉर्क और दक्षिण अफ्रीका तक उनकी तैयार की गई ताजियों की मांग रही है। हालांकि इस वर्ष परिवहन संबंधी चुनौतियों के कारण विदेशों में आपूर्ति प्रभावित हुई है।
हिंदू कारीगर बनाते हैं चांदी के अलम
लखनऊ की गंगा-जमुनी तहजीब की सबसे खूबसूरत झलक मोहर्रम के दौरान देखने को मिलती है।
यहां केवल मुस्लिम कारीगर ही नहीं, बल्कि कई हिंदू परिवार भी वर्षों से चांदी के अलम और धार्मिक प्रतीकों को तैयार करते आ रहे हैं। सर्राफा बाजार में बनने वाले चांदी के अलम और ताजियां विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं।
यह परंपरा धार्मिक सौहार्द और सांस्कृतिक एकता का ऐसा उदाहरण पेश करती है, जिसे लखनऊ की पहचान माना जाता है।
मोहर्रम में बढ़ जाती है रौनक
मोहर्रम के दौरान चौक, नक्खास, घंटाघर और हुसैनाबाद जैसे इलाकों में विशेष रौनक देखने को मिलती है। ताजिया बाजारों में खरीदारों की भीड़ उमड़ती है और कारीगर दिन-रात काम में जुटे रहते हैं।
कई परिवार अपनी परंपरा के अनुसार हर साल नई ताजिया खरीदते हैं, जबकि कुछ लोग विशेष रूप से चांदी या लकड़ी की स्थायी ताजियां बनवाते हैं।



