गोंडा (उत्तर प्रदेश) : गोंडा जिले के नवाबगंज थाना क्षेत्र के कनकपुर गांव में अंधविश्वास के चलते एक 18 वर्षीय युवती कविता देवी की जान चली गई। परिजनों ने बताया कि कविता को बुखार था, और उसे पहले अयोध्या के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन वहां 12 दिन इलाज के बाद भी आराम नहीं मिला। इसके बाद उसे दरगाह हजरत गुप्ती शहीद शाह बाबा मजार (धर्मपुरवा, नवाबगंज) पर झाड़-फूंक के लिए ले जाया गया।
तीन दिन चली झाड़-फूंक, मौत के बाद मजार से भागे कर्ताधर्ता
कविता की मां राधा के अनुसार, वह तीन दिनों से बेटी के साथ मजार पर मौजूद थीं। उन्होंने बताया कि बाबा और अन्य लोग झाड़-फूंक कर रहे थे और दावा कर रहे थे कि कविता पर शैतानी साया है। लेकिन गुरुवार शाम झाड़-फूंक के दौरान कविता की अचानक मौत हो गई। इसके बाद मजार के अध्यक्ष अखलाक अहमद समेत सभी जिम्मेदार लोग मौके से फरार हो गए।
मृतका के पिता बोले: अस्पताल ने कहा ‘शैतानी साया’, इसलिए गए मजार
कविता के पिता, जो पेशे से ऑटो चालक हैं, ने बताया कि श्रीराम अस्पताल, अयोध्या में इलाज के दौरान डॉक्टरों ने कहा कि यह मामला ‘शैतानी माया’ का है। इसलिए उन्होंने मजार पर जाकर झाड़-फूंक का सहारा लिया। लेकिन तीन दिन बाद उनकी बेटी की जान चली गई। अब परिवार पछतावे और ग़म में डूबा हुआ है।
हाल ही में हुई थी शादी, परिवार की माली हालत खराब
कविता की शादी लखीमपुर जिले के गोला गोकर्णनाथ निवासी संतोष से करीब एक साल पहले हुई थी। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण परिवार मेडिकल इलाज के बाद झाड़-फूंक की ओर चला गया। मृतका का भाई ट्रैक्टर चलाता है और घर का खर्च चलाने में पिता की मदद करता है।
मजार पर हर दिन लगती है भीड़, संचालन समिति पर उठे सवाल
धर्मपुरवा स्थित मजार पर बड़ी संख्या में लोग झाड़-फूंक और मन्नतों के लिए पहुंचते हैं। यहां एक संचालन समिति भी बनी है जो आवास, खान-पान और दान की व्यवस्था देखती है। घटना के बाद से समिति के सभी लोग फरार हैं, जिससे उनकी भूमिका पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
पुलिस जांच में जुटी, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से खुलेगा राज
नवाबगंज थाना अध्यक्ष अभय सिंह ने बताया कि मृतका के शव को कब्जे में लेकर पंचायतनामा भरवाया गया और पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया है। परिजनों ने अभी तक कोई तहरीर नहीं दी है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद मौत का सही कारण स्पष्ट होगा।
निष्कर्ष:
गोंडा की यह घटना उत्तर प्रदेश में अंधविश्वास के खतरे को उजागर करती है। जहां इलाज के अभाव में लोग झाड़-फूंक जैसी अप्रमाणिक विधियों की ओर चले जाते हैं, वहीं प्रशासन और समाज को भी आत्मनिरीक्षण की जरूरत है। सवाल यह है कि कब तक ऐसे झूठे इलाज के नाम पर मासूमों की जान जाती रहेगी?

