देशभर: में लगातार सामने आ रहे अग्निकांडों ने एक बार फिर सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्कूल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, होटल, मॉल और अन्य भीड़भाड़ वाले स्थानों पर आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिनमें कई लोगों की जान जा चुकी है। इन हादसों के बाद अब सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें केंद्र सरकार को पूरे देश के लिए एक समान और सख्त राष्ट्रीय अग्नि एवं जीवन सुरक्षा कानून (National Fire Safety Framework) लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
यह याचिका अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी द्वारा दाखिल की गई है। उनका कहना है कि देश में अलग-अलग राज्यों में फायर सेफ्टी के अलग-अलग नियम हैं, जिसके कारण सुरक्षा मानकों का सही तरीके से पालन नहीं हो पाता। इसका परिणाम बार-बार होने वाले भीषण अग्निकांडों के रूप में सामने आता है।
क्यों उठी राष्ट्रीय कानून की मांग?
हाल के महीनों में दिल्ली, लखनऊ और अन्य शहरों में अस्पतालों, कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक इमारतों में आग लगने की कई घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया। कई मामलों में सामने आया कि भवनों के पास वैध फायर एनओसी नहीं थी या सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था।
याचिका में कहा गया है कि जब तक पूरे देश के लिए एक समान और सख्त कानून नहीं बनेगा, तब तक ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल होगा।

तीन से चार महीने में फायर ऑडिट कराने की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि सभी राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे तीन से चार महीने के भीतर विशेष फायर ऑडिट अभियान चलाएं।
इस अभियान में प्राथमिकता के आधार पर इन संस्थानों की जांच की जाए—
- स्कूल
- कोचिंग सेंटर
- अस्पताल
- होटल
- मॉल
- हॉस्टल
- रेस्टोरेंट
- सार्वजनिक भवन
यदि किसी भवन में सुरक्षा मानकों की अनदेखी मिलती है तो उसके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए।
अवैध बेसमेंट और अतिरिक्त मंजिलों पर लगे रोक
याचिका का एक महत्वपूर्ण बिंदु अवैध निर्माणों को लेकर भी है। इसमें कहा गया है कि देशभर में बड़ी संख्या में बेसमेंट, छतों और बिना अनुमति बनाई गई मंजिलों में कोचिंग सेंटर, लाइब्रेरी, हॉस्टल और रेस्तरां संचालित किए जा रहे हैं।
ऐसी जगहों पर अक्सर पर्याप्त निकास मार्ग नहीं होते, जिससे आग लगने की स्थिति में लोग फंस जाते हैं। याचिका में मांग की गई है कि ऐसे सभी अवैध संचालन पर तत्काल रोक लगाई जाए।
फायर एनओसी के बिना चल रहे संस्थानों की सूची मांगी जाए
याचिका में यह भी मांग की गई है कि सभी राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दें कि उनके यहां कितनी इमारतें बिना वैध फायर एनओसी के संचालित हो रही हैं।
इसके साथ ही उन संस्थानों के खिलाफ समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।
एक निकास वाले भवनों पर भी सवाल
याचिका में कहा गया है कि जिन कोचिंग संस्थानों या भवनों में केवल एक ही निकास मार्ग है, वहां छात्रों की सुरक्षा खतरे में रहती है।
ऐसी इमारतों में संचालन पर रोक लगाने तथा पर्याप्त आपातकालीन निकास उपलब्ध कराने की मांग भी की गई है।
संविधान के अनुच्छेद-21 का हवाला
याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्रत्येक नागरिक को सुरक्षित जीवन का अधिकार प्राप्त है।
ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद मुआवजा देने या जांच समिति बनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि दुर्घटनाओं की रोकथाम के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू करना भी उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।
याचिका की पांच प्रमुख मांगें
- पूरे देश के लिए एक समान राष्ट्रीय फायर सेफ्टी कानून लागू किया जाए।
- तीन से चार महीने के भीतर सभी संवेदनशील भवनों का विशेष फायर ऑडिट कराया जाए।
- बिना फायर एनओसी संचालित संस्थानों के खिलाफ कार्रवाई हो।
- अवैध बेसमेंट, छतों और अतिरिक्त मंजिलों पर चल रही गतिविधियों पर रोक लगे।
- एक निकास वाले भवनों में कोचिंग और सार्वजनिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया जाए।
क्या बदल सकती है यह याचिका?
यदि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सकारात्मक आदेश देता है, तो देशभर में फायर सेफ्टी नियमों को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे राज्यों को एक समान सुरक्षा मानकों का पालन करना होगा और सार्वजनिक भवनों में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समयबद्ध फायर ऑडिट, सख्त कानून और जवाबदेही तय होने से भविष्य में होने वाले बड़े अग्निकांडों की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है।
देश में लगातार हो रहे अग्निकांड केवल दुर्घटनाएं नहीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों की ओर इशारा करते हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर यह याचिका यदि प्रभावी दिशा में आगे बढ़ती है, तो स्कूलों, अस्पतालों, कोचिंग सेंटरों और अन्य सार्वजनिक भवनों में सुरक्षा मानकों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आगामी फैसले पर टिकी हैं।

