“हर धार्मिक प्रथा को चुनौती देना खतरनाक हो सकता है” — सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
देश: की सर्वोच्च अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक परंपराओं को लेकर बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा और परंपरा को अदालत में चुनौती दी जाने लगी, तो इससे न केवल धर्म बल्कि समाज की संरचना पर भी गंभीर असर पड़ सकता है।
कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि इससे अदालतों में सैकड़ों याचिकाएं आने लगेंगी और हर धार्मिक रिवाज सवालों के घेरे में आ जाएगा। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब सुप्रीम कोर्ट सबरीमाला मंदिर प्रवेश विवाद और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहा है।
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम मौलिक अधिकारों पर बहस
संविधान पीठ इस समय यह तय करने की कोशिश कर रही है कि धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या होनी चाहिए और कब किसी धार्मिक प्रथा को संविधान के मौलिक अधिकारों के आधार पर चुनौती दी जा सकती है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा,
“अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाने लगेगा, तो भारतीय समाज पर गहरा असर पड़ेगा, क्योंकि भारत में धर्म समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है।”
उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में मंदिरों के खुलने-बंद होने से लेकर धार्मिक रिवाजों तक हर मुद्दा अदालत पहुंच जाएगा, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है।
“धर्म और समाज दोनों टूट सकते हैं”
जस्टिस एमएम सुन्द्रेश ने भी इस दौरान गंभीर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि यदि हर धार्मिक विवाद को अदालत में लगातार चुनौती दी जाती रही, तो एक समय ऐसा आ सकता है जब लोग हर परंपरा और हर व्यवस्था पर सवाल उठाने लगेंगे।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि धार्मिक परंपराओं को समझने और उनसे जुड़े विवादों को सुलझाने का तरीका बेहद संतुलित होना चाहिए ताकि समाज में अनावश्यक टकराव न बढ़े।

दाऊदी बोहरा समुदाय का मामला क्या है?
यह पूरा विवाद दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी एक 40 साल पुरानी जनहित याचिका (PIL) से भी जुड़ा है। इस याचिका में 1962 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है।
दरअसल, 1949 में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट बनाया गया था, जिसके तहत किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी माना गया था। लेकिन 1962 में सुप्रीम Court ने इस कानून को रद्द कर दिया था।
तब अदालत ने कहा था कि किसी सदस्य को धार्मिक आधार पर समुदाय से बाहर करना, धार्मिक समुदाय के अपने मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है और यह संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत संरक्षित अधिकार है।
अब सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह इस फैसले को चुनौती दे रहा है।
वकील राजू रामचंद्रन ने क्या दलील दी?
सुधारवादी समूह की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने अदालत में कहा कि हर धार्मिक प्रथा को केवल “धर्म” कहकर संवैधानिक सुरक्षा नहीं दी जा सकती।
उन्होंने दलील दी कि यदि कोई प्रथा सामाजिक या व्यक्तिगत अधिकारों को प्रभावित करती है या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसे सीमित किया जा सकता है।
रामचंद्रन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता जरूर देते हैं, लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है। यदि कोई प्रथा समानता, गरिमा या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ जाती है, तो अदालत को हस्तक्षेप करने का अधिकार है।
सबरीमाला केस पर भी जारी है सुनवाई
इसी संविधान पीठ के सामने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला भी लंबित है। इस मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई जारी है।
केंद्र सरकार ने सुनवाई के दौरान कहा कि देश में कई ऐसे देवी मंदिर हैं जहां पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इसलिए धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
सरकार ने यह भी कहा कि हर धार्मिक संस्था की अपनी परंपराएं होती हैं और अदालतों को उनमें दखल देने से पहले बेहद सावधानी बरतनी चाहिए।
समाज और संविधान के बीच संतुलन की चुनौती
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब देश में धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस लगातार तेज हो रही है।
एक ओर समाज में सुधार और समानता की मांग उठती है, तो दूसरी ओर धार्मिक समुदाय अपनी परंपराओं और स्वायत्तता को बनाए रखने की बात करते हैं। ऐसे में अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों में अदालतें बेहद सतर्क दृष्टिकोण अपनाना चाहती हैं। कोर्ट का मानना है कि हर धार्मिक परंपरा को कानूनी चुनौती देने से समाज में अस्थिरता पैदा हो सकती है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि संविधान पीठ इन संवेदनशील मामलों में अंतिम फैसला क्या सुनाती है।

