नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एक बार फिर आपातकाल और 1976 में संविधान की प्रस्तावना में किए गए बदलाव पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में बदलाव नहीं किया जा सकता क्योंकि यह वह “बीज” है जिससे पूरे संविधान का ढांचा तैयार होता है। लेकिन 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता जैसे शब्द जोड़े गए, जिस पर आज फिर से विचार होना चाहिए।
📘 पुस्तक विमोचन समारोह में दिया गया बयान
उपराष्ट्रपति ने एक पुस्तक विमोचन के दौरान कहा:
“भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां संविधान की प्रस्तावना में बदलाव किया गया। अन्य किसी लोकतांत्रिक देश में इसकी हिम्मत नहीं हुई। क्या हम इसे स्वीकार कर सकते हैं?”
धनखड़ ने कहा कि बीआर अंबेडकर ने जिस सावधानी से संविधान का निर्माण किया, वह इन शब्दों के बिना भी पूर्ण था।
🕰️ 1976 का 42वां संशोधन: क्या बदला गया था?
इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल (1975-77) के दौरान संविधान में 42वां संशोधन पारित किया था। इसके तहत:
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“We, the people of India…” के बाद “socialist” और “secular” शब्द जोड़े गए
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“unity of the nation” को बदलकर “unity and integrity of the nation” किया गया
🗨️ RSS की तीखी प्रतिक्रिया और मांग
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने इस मुद्दे पर समर्थन जताते हुए संविधान की प्रस्तावना की समीक्षा की मांग की है।
सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा:
“समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द कभी अंबेडकर द्वारा बनाए संविधान का हिस्सा नहीं रहे। इन्हें आपातकाल के दौरान राजनीतिक मंशा से जोड़ा गया। कांग्रेस को इसके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए।”
🧾 ऑर्गेनाइज़र में प्रकाशित लेख में क्या कहा गया?
संघ की साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गेनाइज़र ने एक लेख में लिखा:
“42वां संशोधन संविधान सभा की भावना के विरुद्ध था। यह कदम एक राजनीतिक चाल था, संविधानिक चिंतन नहीं।”
🧿 कांग्रेस की पलटवार प्रतिक्रिया
कांग्रेस पार्टी ने RSS और उपराष्ट्रपति के बयानों पर कड़ा जवाब देते हुए कहा:
“संविधान की आत्मा पर यह जानबूझकर किया गया हमला है। संघ ने कभी संविधान को स्वीकार ही नहीं किया। अब वे अंबेडकर की समावेशी सोच को मिटाने की साजिश कर रहे हैं।”
🇮🇳 क्या है प्रस्तावना का महत्व?
संविधान की प्रस्तावना भारत की लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और संप्रभुता आधारित पहचान का मूल आधार मानी जाती है।
कई संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, प्रस्तावना का कोई “legal enforceability” नहीं है, लेकिन यह नीतिगत मार्गदर्शक सिद्धांत की तरह कार्य करती है।
❓ विवाद क्यों बढ़ रहा है?
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राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में यह बहस अब फिर केंद्र में आ गई है
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2024 के बाद नया जनादेश और भाजपा की मजबूती ने विचारधारा आधारित बदलावों की जमीन तैयार की
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संघ और सरकार दोनों में संविधान की समीक्षा की आवाजें मुखर हो रही हैं
✅ निष्कर्ष:
धनखड़ का यह बयान न सिर्फ आपातकाल की आलोचना है, बल्कि यह भविष्य की संवैधानिक दिशा को लेकर एक संकेत भी है।
क्या अब संविधान की प्रस्तावना की पुनः समीक्षा होगी?
यह सवाल आने वाले समय में संसद, कोर्ट और जनचर्चा का केंद्र बन सकता है।

